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आंदोलन को निगलती राजनैतिक महत्वाकांक्षा

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सरकारी कारगुजारियों से परेशान हो स्वतंत्रता के बाद भारत मे ३ ऐसे आंदोलन हुए जिन्होने सत्ता परिवर्तन किये हैं, और तीनो बार ही सत्ता परिवर्तन आंदोलनों के द्वारा जनजागरण कर के संभव हो सके. ७० के दशक अंत मे हुआ सत्ता परिवर्तन जेपी के संपूर्ण क्रांति के आह्वान के आंदोलन द्वारा, १९८९ मे बोफोर्स कांड और भ्रष्टाचारियों के बचाव के प्रयासों से त्रस्त हो वीपी सिंह के आंदोलन द्वारा और १९९९ मे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आंदोलन ने ऐसा ऐसा संभव किया, किंतु सत्ता परिवर्तन के बाद भी भारतीय जनमानस त्रस्त ही रहाइन आंदोलनों का तात्कालिक परिणाम सत्ता परिवर्तन के रूप मे दिखा किंतु इन्हीं आंदोलनो को सीढी बना कर अनेको व्यक्तियों ने स्वयं को राजनैतिक पटल पर स्थापित किया.

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आई.ए.सी. और टीम केजरीवाल

लगभग ढाई वर्ष पूर्व कुछ लोगों ने फेसबुक पेज के माध्यम से एक आंदोलन की परिकल्पना की, और तकनीकि रूप से कुशल व्यक्तियों ने इस विचार को फेसबुक के माध्यम से आम लोगो का आंदोलन बनाया और इसे आई.ए.सी. नाम दिया, किंतु ४ अगस्त २०१२ को आई.ए.सी. के अंदर के ही एक समूह की महत्वाकांक्षा ने इस आंदोलन को निगल डाला. यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आई.ए.सी. वह टीम नही है, जिसे केजरीवाल टीम ने कोर टीम का नाम दिया था. आई.ए.सी. एक आम नागरिकों का आंदोलन है जो कि इसने आंदोलन शुरु करने से पहले ही घोषित कर दिया था, जब केजरीवाल जी भी इस आंदोलन का हिस्सा नही थे, टीम केजरीवाल ने इस आई.ए.सी. के अंदर अपनी एक कोर टीम बना कर उसे ही आई.ए.सी. का कर्ता धर्त्ता होने का प्रचार प्रसार किया है, इस कारण से जिन्हें आई.ए.सी. के बनाये जाने के कारणो और उसकी कार्यशैली का ज्ञान नही है वह टीम केजरीवाल को ही आई.ए.सी. होने के भ्रम को सत्य मानते हैं.

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आई.ए.सी. और टीम केजरीवाल

लगभग ढाई वर्ष पूर्व कुछ लोगों ने फेसबुक पेज के माध्यम से एक आंदोलन की परिकल्पना की, और तकनीकि रूप से कुशल व्यक्तियों ने इस विचार को फेसबुक के माध्यम से आम लोगो का आंदोलन बनाया और इसे आई.ए.सी. नाम दिया, किंतु ४ अगस्त २०१२ को आई..सी. के अंदर के ही एक समूह की महत्वाकांक्षा ने इस आंदोलन को निगल डाला. यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आई..सी. वह टीम नही है, जिसे केजरीवाल टीम ने कोर टीम का नाम दिया था. आई..सी. एक आम नागरिकों का आंदोलन है जो कि इसने आंदोलन शुरु करने से पहले ही घोषित कर दिया था, जब केजरीवाल जी भी इस आंदोलन का हिस्सा नही थे, टीम केजरीवाल ने इस आई..सी. के अंदर अपनी एक कोर टीम बना कर उसे ही आई..सी. का कर्ता धर्त्ता होने का प्रचार प्रसार किया है, इस कारण से जिन्हें आई..सी. के बनाये जाने के कारणो और उसकी कार्यशैली का ज्ञान नही है वह टीम केजरीवाल को ही आई..सी. होने के भ्रम को सत्य मानते हैं.

आई..सी. के जन्म के जो भी कारण थे, वो आज भी वहीं हैं, किंतु जनलोकपाल की मृत्यु के शोक को जिस प्रकार से राजनैतिक पार्टी के जन्म का उत्सव मनाकर एक योजनाबद्ध उपाय से दबाया गया, उस से आंदोलन को अपना समय, विचार, धन, मन, शरीर और समर्थन देने वालों को जो धक्का लगा है उस हानि को अब शायद कभी पूरा ना किया जा सके. जिन कारणो को बता कर आंदोलन और जनलोकपाल की बात को समाप्त किया गया, उन कारणों का अंदेशा तो कोई भी दूरदर्शी व्यक्ति आंदोलन से पहले ही सोच सकता था. यह तो संभव ही नही था कि कोई सत्ताधारी और भ्रष्टता और कुकृत्यों की सजा पाने के लिये जनलोकपाल बिल को पास होने देगा और यह बात तो केजरीवाल टीम के जनलोकपाल मे भी देखी गयी, उनकी टीम भी किसी एनजीओ को जनलोकपाल के अंदर नही लाना चाहती. जिस प्रकार से यह टीम स्वयं के ऊपर उंगली उठा सकने वाली किसी प्रणाली को जन्म नही देना चाहती तो वह यही अपेक्षा सत्ताओं से कैसे कर सकी?

अपने प्रभुत्व के समाप्त हो जाने के भय से ग्रस्त यह टीम किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपने साथ जोडने और जुडने का विरोध करती रही, जिससे इन्हें आंदोलन मे अपने प्रभुत्व और महत्वाकांक्षा के समाप्त हो जाने का खतरा लगा. और अपने इसी भय को देखते हुए इस टीम ने अनेकों सक्षम और दूरदर्शी लोगों को अपनी टीम के साथ साथ आई..सी. से भी दूर किया या फिर दूर जाने दिया. डा. स्वामी, बाबा रामदेव, जलपुरुष राजेंद्र सिंह व अन्य जो अपने अपने क्षेत्रों में अपनी कार्य दक्षता को सिद्ध कर चुके थे, उनके जाने के लिये परिस्थिति तैयार की गयी, परिणाम यह हुआ कि बौद्धिक व वैचारिक रूप से दृढ, और सांगठनिक स्तर पर कार्य कर सकने वाले व्यक्ति एक एक कर आई..सी. से दूर होते गये. महत्वाकांक्षा और प्रभुत्व की इच्छा ने इतना अधिक अहं को पोषित किया कि समान विचारधारा (जहां तक भ्रष्टाचार के विरोध की बात थी) रखने वाले अन्य आंदोलनों से स्वयं को दूर रखा गया, और वो सभी जो भ्रष्टाचार हटाने के प्रतिबद्ध हैं, वे सब साथ आयेंके स्थान पर मैं ही भ्रष्टाचार को मिटा सकने में सक्षम हूं, अतः सभी को मेरे ही अनुसार चलना होगावाली मानसिकता आई..सी. की इस टीम मे घर करती गयी. इस टीम ने साथ मे आये प्रत्येक बुद्धिजीवी का उपयोग किया, जो व्यक्ति अपने लिये उपयोगी लगा, उसे मंच पर बैठाया गया, और उसका पूरा उपभोग करने के बाद उन्हे कहा गया कि आना चाहें तो आयें, किंतु नीचे बैठना होगा. इतना ही नही, अहंकार इतना बढ चुका था कि स्वयं भ्रष्ट लोगों के काले धन को वापस लाने के आंदोलन मे जाने मे भी संकोच किया गया. जिस कारण सत्ता को मौका मिला और ४ जून २०११ को रामलीला मैदान पर सत्ता मद अपने पूरे वेग से बहा.

टीम को बनाने के उद्देश्य चाहे जितने भी पवित्र हों किंतु उसकी कार्यशैली मे वो शुचिता नही थी, आई..सी. को उसके मूल स्वरूप मे ही काम करते रहने देने वाले के इच्छुक कार्यकर्त्ता जो इस टीम के सदस्य नही बनना चाहते थे, उनसे भी यही अपेक्षा की जाने लगी कि वह भ्रष्टाचार के विरोध मे खडे एक आंदोलन के स्थान पर केजरीवाल टीम के पीआरओ की भांति काम करें, इसका स्पष्ट संकेत और प्रमाण आई..सी. आंदोलन के जन्मदाता शिवेंद्र सिंह चौहान के पत्र मे दिखता है, जो उन्होने टीम के सदस्य केजरीवाल जी को लिखा. जिस स्वयंभू टीम के गठन मे ही पारदर्शिता नही थी, उस टीम को आंदोलन के ऊपर थोपा गया, और विरोध किये जाने के प्रत्येक प्रयास को खत्म करने के लिये अन्ना जी की आड ले ली गयी.

यह कभी स्पष्ट नही हो सका कि केजरीवाल टीम अस्पृश्यता की भावना क्यों पालती रही? क्या इसके कारण से होने वाली हानि उन्हे दिखाई नही दे रही थी, या फिर स्वयं को स्थापित करने के प्रयास मे वह आई..सी. के आंदोलन के उद्देश्य को भूल चुके थेबजाय इसके कि स्वार्थी और महत्वाकांक्षी लोगो को आंदोलन से दूर रख कर समान विचार धारा के लोगो को ज्यादा से ज्यादा जोड कर उनके साथ आंदोलन को आगे बढाया जाता.. कुछ स्वार्थी और स्वकेंद्रित लोगो ने आंदोलन की दिशा को पहले प्रभावित किया और अंत मे उसकी दिशा ही बदल दी. जो आंदोलन भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये और राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने के लिये उभरा था, वह कुछ लोगो की स्वयं को राजनैतिक दलों के समकक्ष खडा करने की इच्छा का पोषण करता दिखाई देने लगा.

जनलोकपाल का गठन नही होगा, यह तो पहले दिन से ही स्पष्ट था, किंतु उस मांग पर पहले भीड को इकट्ठा करना, और उस भीड को इकट्ठा करने हेतु रामदेव व अन्ना जी जैसे वृहद जनाधार वाले व्यक्ति का सहारा लेना, साथ मे डा. स्वामी, महेश गिरी जी, किरन बेदी, संतोष हेगडे, राजेंद्र सिंह व अन्य लोगो को बैठाना, ताकि उस से यह संकेत जाये कि हम भ्रष्टाचार के विरोधी हैं और हमें प्रबुद्ध लोगो का समर्थन प्राप्त है, इन सभी लोगो का सहारा लेने के बाद, भीड मे अपने को प्रचारित और प्रसारित करना. इस व्यूह रचना के साथ अपनी महत्वाकांक्षा को आगे बढाया. भावुक लोग अन्ना व बाबा रामदेव को देख एकत्र हुए, किंतु उस समय जो संगठन भ्रष्टाचार के विरोध मे आगे आये, और केजरीवाल टीम को समर्थन दिया, उनसे यह कोर टीम भयभीत हुई, और अपने प्रभुत्व के समाप्त हो जाने की आशंका से भयभीत टीम ने कई बार ऐसे बयान दिये गये जो अनावश्यक थे. जिनसे आंदोलन के समर्थक दूर होते गये. आई..सी. की मूल भावना कि सभी लोगों को साथ ले कर भ्रष्टाचार का विरोध किया जाये, के बजाय गलत समय पर गलत निर्णय लिये गये (बुखारी से सहयोग मांगा गया), गलत लोगो को साथ मे जोडा गया (अग्निवेश), गलत बयान दिये गये (काश्मीर अलगाववादी). आंदोलन की मजबूती बनाये रखने के लिये नेतृत्व, कार्य और विचार मे दृढता लाने के स्थान पर लोगो को भावुक कर आंदोलन से जुडने के लिये कहा जाने लगा. अनेको मैसेज और बयान जिसमे आगे की कार्य योजना, विरोध की प्रकृति, सत्ता पर दबाव डालने की योजनाओं के स्थान पर अन्न्ना जी बूढे हैं, बीमार हैं, केजरीवाल जी डॉयबेटिक हैं, बलिदान दे देंगे जैसे भावुकता बढाने वाले संदेश दे कर लोगो को जोडने का प्रयास किया. तब तक देर हो चुकी थी, अनेको व्यक्ति जो आंदोलन के प्रथम चरण मे अपनी पूरी शक्ति के साथ लगे थे, वह आंदोलन की बदलती प्रवृत्ति से खिन्न हो चुके थे. और मात्र साधारण लोग ही नही, इस आंदोलन को जन्म देने वाले आई..सी. के फेसबुक के उस पेज को भी चुपचाप गुप्त रूप से आंदोलन से बाहर कर दिया, जिसने पिछले २ वर्षों मे सफलता पूर्वक आंदोलन का पूरा दायित्व उठाया था. आंदोलन का आरंभिक कैडर इस पेज के द्वारा ही बना था. किंतु उस पेज पर केजरीवाल टीम के व्यक्तियों के स्थान पर आंदोलन को प्राथमिकता मिलती देख नया पेज बनाया गया, और उसको ही अधिकारिक पेज कहा जाने लगा. पिछले ढाई वर्षों मे आई..सी. ने अपने पेज पर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चला कर ६ लाख से अधिक लोग जोडे थे, और यह लोग मात्र उस पेज पर ही नही, वह आदोलन से भी प्रत्यक्ष रूप से जुडे थे.

केजरीवाल टीम की योजना स्पष्ट थी, जब भावुक संदेशों के बाद भी २५ जुलाई को अपेक्षाकृत समर्थन नही मिला, और ना ही सत्ताओं ने कोई रुचि दिखाई, तो यह समय केजरीवाल टीम को अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का उपयुक्त समय लगा. और एक अतार्किक और अनावश्यक निर्णय को इस प्रकार से प्रदर्शित किया गया, कि इसके अतिरिक्त और कोई साधन नही बचा है. जबकि यह पूर्ण रुपेण गलत था. ढाई वर्ष के आंदोलन से सत्ताओं पर दबाव बनना शुरु हो गया था. यदि केजरीवाल टीम अपने अहं, महत्वाकांक्षा को दबा कर मात्र देशहित मे प्रयास करती, तो सत्ताओं को धराशायी करना कोई कठिन कार्य नही था. यदि अपने स्वहित, राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को दबाकर अन्य लोगो से सहयोग लिया गया होता तो आज केजरीवाल जी के साथ एक ऐसी टीम खडी होती जिसमे आरएसएस जैसा मजबूत कैडर, बाबा रामदेव की गांवो तक पहुंच, आर्ट ऑफ लिविंग की सामाजिक स्वीकार्यता, डा.स्वामी जैसे भ्रष्टाचार विरोधी, डोभाल जैसे सिस्टम को जानने और समझने वालेअधिकारी, एस.गुरुमूर्ति जैसे अर्थशास्त्री, भाजपा की राजनैतिक शक्ति और गोविंदाचार्य जैसे सांगठनिक नेतृत्व देने वाले होते. किंतु मात्र अपने लाभ के लिये केजरीवाल टीम ने अपने लिये एक कुंआ बना लिया था जिसमे किसी और को ना वो आने देना चाहते थे, और बाहर निकल कर किसी और के पास जाने की मानसिकता भी उनकी नही थी.

४ अगस्त को हुई घोषणा के परिणाम आगे ही मिलेंगे, एक राजनैतिक दल जिसके पास एक नियम को पास कराने के हठ के अतिरिक्त कुछ भी नही, उसका प्रदर्शन कैसा रहेगा, यह भविष्य तय करेगा, किंतु इस से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को कोई लाभ मिलेगा, यह तो अभी संभव नही लगता. इस राजनैतिक दल के गठन के दूरगामी परिणाम समाज और राष्ट्र के लिये ठीक नही होंगे, यह तो निश्चित सा लगने लगा है. किंतु जो आशा है, वो अभी आई..सी. से है, आई..सी. को जिस प्रकार से केजरीवाल टीम ने जकड रखा था, उसके पास अभी अपना आधार है, केजरीवाल टीम ने आई..सी. की मूल भावना (आई..सी. एक आम नागरिकों का आंदोलन है, जो भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये किया गया है ) के उलट राजनैतिक दल की घोषणा की है, किंतु यह केजरीवाल टीम की घोषणा है, आई..सी. अभी भी अपने मूल स्वरूप मे ही काम कर रहा है, अतः अधिक उचित होगा कि आई..सी. अपने मूल स्वरूप मे ही आंदोलन को आगे बढाये और समान विचार धारा के लोगो के साथ जुड कर राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त करने का प्रयास करे. जनलोकपाल बिल को तो सत्तायें कभी पास नही करेंगे, किंतु आई..सी. भ्रष्ट लोगों के नामों को उजागर करने की मांग का हठ कर सकती है, क्योंकि इसमे कोई भी सत्ता यह नही कह सकती कि यह संवैधानिक मामला है और इसे तय करने के लिये कोई बैठक या कमेटी बनानी पडेगी, इस प्रकार के बहाने जनलोकपाल के लिये तो बनाये जा सकते हैं किंतु भ्रष्ट लोग, जिनके खाते स्विस बैंको मे थे, उनके नाम उजागर करने के लिये नही. और इस मांग को ही आधार बना कर आई..सी. डा.स्वामी की ए.सी..सी.आई. के साथ सडकों पर उतरे तो भविष्य के आंदोलन को सही दिशा मिले और राष्ट्र की दशा मे सुधार हो.

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राजनैतिक शून्य और विकल्पहीनता…

अंततः जैसा अपेक्षित था, आगामी माह मे होने चुनावों के प्रपंच अपनी चरम सीमा पर पहुंचने लगे हैं, और इन सभी प्रपंचो का एक मात्र लक्ष्य सत्ता पर पहुंचना है. जो भारतीय समाज के लिये अनावश्यक और अवांछनीय है, क्योंकि सत्ता पर कोई भी पहुंचे उसका आचरण बदलने की संभावना असंभव लगती है.

राजनीतिक दलों के कार्यकलापों और उनके घोषणा पत्रों मे कोई भी साम्यता नही दिखाई देती है, और यह बीमारी सभी दलों की जडों तक को सडा चुकी है. विधान सभाओं मे संख्या बल प्राप्त करने के लिये धनबल, बाहुबल के साथ साथ समाज का विघटन करने वाली नीतियों की घोषणा चुनाव से पहले ही की जाने लगी हैं. राजनैतिक दलों मे वैचारिक शून्यता स्पष्ट दिखाई देती है. जिस विचार की घोषणा राजनैतिक दल करते हैं वह उनकी कार्यशैली मे कहीं भी नही दिखाई देता है, और जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है वह संख्या बल को प्राप्त करने की लिप्सा है जिसके लिये वह स्वयं के चारित्रिक गुणो और राष्ट्र, दोनो को रसातल मे पहुंचाने के लिये प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं. एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद दलों के प्रतिनिधि राष्ट्रजीवन के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक विकास के स्थान पर स्वयं के भी मात्र आर्थिक विकास मे जुट जाते हैं.
चुनाव की पद्धति यदि ठीक ना भी मानी जाये, तो भी दोष मात्र शासक वर्ग का नही है, भारतीय जनमानस सत्ताओं मे अपना भय व्याप्त करने मे पूरी तरह विफल रही है. सत्ता मे बैठा अधिकांश वर्ग जानता है कि उसे चुनौति देने और उखाड फैंकने वाला कोई कारक फिलहाल अस्तित्व मे आने वाला नही है. जो वोट देने की शक्ति सामान्य व्यक्ति के पास है उस से वह मात्र सत्ता मे विद्यमान व्यक्ति को तो बदल सकता है किंतु उस पद पर जाने वाले व्यक्ति के आचरण पर प्रभावी दबाव नही डाल पाता, और इस प्रकार के दबावों के अभाव ही सत्ताधारियों को निरंकुश बनाते हैं. परिणाम यह है कि व्यक्ति यदि सत्ता मे है तो बिना किसी भय के वह आर्थिक घोटाले करता है (राष्ट्रमंडल खेल घोटाला), सामाजिक व्यभिचार करता है (भंवरी देवी प्रकरण), अपव्यय करता है (मूर्ति व पार्कों के निर्माण), राष्ट्र सुरक्षा से समझौता करता है (बोफोर्से कांड), गलत नीतियां बनाता है (बढती महंगाई) और वोटर निःसहाय देखता रहता है. उच्च वर्ग पर इन चीजो से प्रभाव नही पडता बल्कि उसे इसका लाभ मिलता है. मध्यम और निम्न वर्ग का दोहन किया जाता है, और स्थिति यह हो गयी है कि यह वर्ग अब वोट देने से कतराने लगा है. वह या तो वोट देने नही जाता और यदि उसे कहा जाये तो वो प्रश्न करता है कि “किसे दूँ?”
मध्य वर्ग का यह प्रश्न राजनैतिक दलों के लिये एक गंभीर चुनौति है, यदि वोटर सबको एक समान समझता है तो यह राजनैतिक दलों की विफलता है कि वह अपने आप को अन्य दलों से अलग प्रदर्शित नही कर सके और जनता के सामने एक विकल्प के रूप मे नही उभर सके.

९० के दशक तक राजनीति का इतना अधिक विकृत चेहरा शायद संचार माध्यमों की सीमितता के कारण उजागर नही हो सका था.  बाद मे विकसित हुए संचार माध्यमो पर चलने वाले समाचार चैनलों को पहले राजनीतिज्ञों ने अपने प्रचार प्रसार का साधन बनाया (जो कि अभी तक निरंतर है), किंतु क्योंकि यह संचार माध्यम किसी ना किसी एजेंसी द्वारा संचालित होते थे तो इन पर सत्तायें दबाव बनाये रख सकती थी, चाहे वो विभिन्न मंत्रालयों के विज्ञापनों के मोटे भुगतान द्वारा अनुग्रहित कर, या किसी अन्य प्रक्रिया के द्वारा, (जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण व्यवसायिक घरानो, राजनीतिज्ञों और पत्रकारों की बातचीत मे भी मिला कि किस प्रकार एक संपूर्ण प्रणाली राष्ट्र के स्थान पर स्वयं के विकास मे लिप्त है.) किंतु धीरे धीरे यह संचार माध्यम लोगो मे उन घोटालों को भी पहुंचाने लगे, जिसकी अपेक्षा राजनीतिज्ञों को कभी नही थी. और इसमे तीव्रता तब आई जब इंटरनेट और मोबाइल जैसे साधन भी लोगो को उपलब्ध हो गये. यह दो माध्यम ऐसे थे जिस पर किसी का भी नियंत्रण नही था, मध्यम वर्ग इसका उपयोग बहुतायत से करने लगा था. सत्ताओं ने इन्हे उपलब्ध कराया (उसमे भी करोडों का गोलमाल किया गया), और लोगो को आपस मे संवाद करने का एक विकल्प मिला, धीरे धीरे यह माध्यम भस्मासुर होने लगे. जो मध्यम वर्ग पिछले कई वर्षों से पीडित था और जिस पीडा को वह दूसरों को वह ना तो दूसरों को बता पाता था और ना ही पुराने संचार माध्यम उसकी आवाज को कभी सत्ता के कानो तक पहुंचाते थे,वह अपनी समस्याओं को एक दूसरे के साथ बांटने लगा और उसे पता चला कि वह अकेला नही है बल्कि सत्तायें पूरे समाज को मूर्ख बना रही हैं.
इन माध्यमों ने घटनाओं को तेजी से फैलाना शुरु किया, डा० सुब्रमण्यम स्वामी ने जब घोटालों को प्रकट किया तो सभी राजनैतिक दल इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते थे, किंतु उसके लिये जो शुचिता और पवित्रता विचारों और कार्यों मे होनी चाहिये थी वह कोई दल नही दिखा सका और ना ही कोई दल स्वयं को विकल्प के रूप मे प्रस्तुत कर सका. भ्रष्टाचार के प्रकटीकरण के बाद उसके विरोध करने के लिये किसी के भी उपलब्ध ना होने का सबसे अधिक लाभ इंडिया अगेन्स्ट करप्शन ने उठाया और स्वयं को भ्रष्टाचार के विरोध करने वालों मे अग्रणी स्थान पर ला खडा किया. आरंभिक सफलता के अति-उत्साह और उससे उत्पन्न अहंकार, अदूरदर्शी निर्णय, गलत विचारधारा के लोगो का साथ और आवश्यकता से अधिक अस्पृश्यता ने उनके आंदोलन को धीरे धीरे कमजोर करना शुरु किया. पेज के एडमिन शिवेंद्र सिंह चौहान जी ने एक साक्षात्कार मे कहा कि अन्ना टीम का पेज यूजर कंटेंट के द्वारा चलता है और यूजर उस पर अपने विचारों को रखता है, किंतु बाद मे स्थिति यह हो गयी कि जिस अन्ना टीम के फेसबुक पेज पर भ्रष्टाचार के समाचार लगातार अपडेट होते रहते थे और जहां लोग अपने विचारों और पीडाओं को रखते थे उस पेज पर अन्ना टीम ने क्या कहा, क्या किया, समर्थन मे कहां जुलूस निकला, कहां हस्ताक्षर हुए, कहां पोस्टर लगे जैसे समाचारों का आधिपत्य हो गया. वह यह तक नही समझ सके कि दिल्ली का व्यक्ति चेन्नई मे निकले जुलूस की सूचना पा कर क्या करेगा या उस पर अपने विचार और पीडा को क्यों प्रकट करेगा? जो पेज परस्पर संवाद का था वह एक सूचना पट्ट मे परिवर्तित हो गया (वैसे यह स्थिति अब पिछले कुछ दिनों से फिर बदलने लगी है) और राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने का जो एक प्रयास था वह अदूरदर्शिता के कारण धीरे धीरे कमजोर होता चला गया.
मुख्य समस्या यह है कि हमें एक ऐसी प्रणाली चाहिये जिसके द्वारा सत्ताओं मे आम जनमानस का भय उत्पन्न किया जा सके. इसके विकल्प मे राइट टू रिजैक्ट, राइट टू रिकॉल जैसी व्यवस्था की बात की जाती है, किंतु यह संवैधानिक व्यवस्थाये हैं, और कोई सत्ता ऐसे भस्मासुर को जन्म लेने देगी यह फिलहाल अकल्पनीय है, और यदि सत्ता परिवर्तन किया जाता है तो वो मात्र व्यक्ति परिवर्तन ही होगा, आचरण और क्रिया कलापों मे कोई परिवर्तन आने की संभावना बहुत क्षीण है. नई पार्टी का गठन करने का प्रयास शायद ही कोई करे.

मुझे लगता है यदि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र मे १५-२० ऐसे व्यक्ति, जो किसी भी प्रकार की राजनैतिक गतिविधियों से अलिप्त हो, को मिलाकर एक प्रभावी समूह (pressure group) बनाया जाये जो अपने क्षेत्र के विधायक को उसके अधिकारों और दायित्वो के प्रति बोध दिलाता रहे और प्रत्येक दो मास के अंतराल पर क्षेत्र के विकास के लिये किये गये नेता के प्रयासों के बारे मे पूछताछ और उसके द्वारा दी गयी जानकारी पर उसकी जांच कर सके (जांच का अर्थ मात्र उसके द्वारा किये गये विकास कार्यों को देख सके) और असत्य होने की स्थिति मे उस पर दबाव डाल सके (चाहे वह दबाव उसके द्वारा बताये गये झूठ को इंटरनेट पर डालना हो या फिर स्थानीय समाचार पत्रों मे छपवाना हो) तो इस प्रकार की नियमित पूछताछ द्वारा जनप्रतिनिधियों पर आवश्यक दबाव और नियंत्रण बनाया जा सकेगा, जिस से कम से कम वह क्षेत्र के विकास पर ध्यान दे सके. इसके अतिरिक्त जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है, कई बार स्थिति यह होती है कि जन प्रतिनिधियों को पता ही नही होता कि क्षेत्र मे काम कराने के लिये उसे किस प्रकार से प्रोसेस करना है.
इस प्रकार के समूह बनाने के लिये कोई औपचारिकताओं की आवश्यकता भी नही है और ऐसे समूहों का निर्माण करना समय की आवश्यकता और सबसे सुलभ भी है. आखिर जब राजनैतिक दल और इंडिया अगेन्स्ट करप्शन जैसे समूह नगर स्तर तक अपने कैडर बना सकते हैं तो फिर इस देश के ईमानदार और निष्पक्ष व्यक्ति ऐसा क्यों नही कर सकते..
मेरे विचार निजी है और गलत या अव्यवाहारिक भी हो सकते हैं किंतु इसमे किसी भी प्रकार का कोई विचार यदि प्रस्तुत करना चाहे तो उनका स्वागत है..

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जंतर मंतर पर बैठा सवाल..

वो सब जो अपने अपने काम छोड़ कर अन्ना को समर्थन देने आये थे और अन्ना हजारे, सभी वापस चले गये। सत्ताओं मे मची हलचल अभी शांत नही है, सत्तायें अभी व्यस्त हैं , इस अचानक आई स्वाभाविक आपदा और चुनौति का सामना करने के लिये साधनो की खोज जारी है. कुछ ने हथियार डाल दिये हैं और स्वीकार कर लिया है कि वो अन्ना के बिल को समर्थन देने को तैयार हैं और कुछ प्रतीक्षा करो और देखो की नीति पर चल रहे हैं।

अन्ना हजारे के उठने के बाद भी एक प्रश्न जंतर मंतर पर अभी तक बैठा हुआ है, कि आखिर कब तक आम आदमी को अपने काम छोड़कर सत्ताओं को समझाने के लिये जंतर मंतर पर आना पड़ेगा? आखिर सत्तायें उन प्रणालियों का ठीक से प्रयोग क्यों नही करती हैं जिसके गुणगान वो पूरे विश्व के सामने करती रहती हैं कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, किंतु ये तथ्य किसी को नही बताती कि हमने इस लोकतंत्र को चौथे नंबर का भ्रष्ट तंत्र भी बनाया है। एक आम आदमी सत्ताओं से सिर्फ यही अपेक्षा रखता है कि उसके जीवन स्तर का सुधार हो, और उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक साधन उचित दामो पर उपलब्ध हों, उच्च वर्ग की भूख कुछ अलग प्रकार की है, उसे शक्ति और विलासिता की भूख होती है। सत्ताओं ने उच्च वर्ग की लिप्साओं का लाभ उठाते हुए उनके साथ गठजोड़ स्थापित किये ताकि दोनो को आर्थिक सम्पन्नता के साथ साथ शक्ति केन्द्र मे स्थान भी मिल सके, स्वयं को चुनौति देने वाले सभी कारकों को अपने पक्ष मे करने के लिये उन्होने लोकतंत्र के सभी स्तंभों को अपने जैसी विलासिता देने का लोभ दे कर उन्हे उनके दायित्वों से विमुख किया। लोकतंत्र के चारों खंबे आज लोकतंत्र की छत को मजबूत करने के स्थान पर स्वयं की विलासिता के साधनों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वो ये भूल रहे हैं कि उनका कार्य लोकतंत्र की उस छत को संभालना है जिसके नीचे सामान्य व्यक्ति रहता है। यदि कोई भी एक स्तंभ अपने दायित्व से मुँह मोड़ता है तो अन्य स्तंभो की ये जिम्मेदारी और बढ जाती है। किंतु वर्तमान परिस्थिति मे स्तंभो मे अहं का भाव और विलासिता की इच्छा जागी हुई है। छत जर्जर है और उसके नीचे रहने वाले सामान्य व्यक्ति को उसकी चिंता है, और यही वो कारण है कि चार दिनों तक वो सामान्य आदमी इस छत को संभालने की चेतावनी देने के लिये जंतर मंतर पर आ डटा था।

देश के विभिन्न नगरों मे बनाये गये इन जंतर मंतरों पर एकत्र लोगो का क्रोध मात्र सत्ताओं के प्रति नही था, उन अन्य संस्थाओं के प्रति रोष भी था जो सत्ताओं को उनके दायित्व का बोध नही करा सके, और बोध कराना तो बहुत दूर वो स्वयं इस शक्ति को प्राप्त करने की भूख मे शामिल हो गये। इंडिया गेट पर हुई नारेबाजी एक स्पष्ट संकेत था कि विभिन्न समाचार चैनलों पर समाचारों को विज्ञापन की तरह दिखाना और पीठ पीछे सत्ता की बिछी हुई दरी पर अपना स्थान बनाये रखने के लिये षडयंत्र रचना, ये स्वीकार नही किया जा सकता।

सत्ताधारी समझदार (घाघ) हो जाते हैं। समय को अनुकूल ना पा कर, समय को अनुकूल होने तक के लिये उन्होने जंतर मंतर पर आ कर अपने लिये समय मांग लिया, और भीड़ के हटते ही अपना चेहरा दिखाना शुरु कर दिया। वो जानते हैं कि लोगो को एकत्र करना बहुत दुरूह कार्य है, और स्वाभाविक रूप से लोग किसी सत्ता के विरोध मे एकत्र हो जायें ये तो दुर्लभ ही होता है। इसी विश्वास को ध्यान मे रखते हुए शायद सत्ताओं ने समय की मांग की। लोकतंत्र की समस्या ये है कि यहाँ हर एक को स्वयं को बचाने के लिये दूसरे को उत्तरदायी ठहराने का मौका मिलता है। सत्ता कहती है हमें जनता ने चुना है, जनता कहती है कि सत्ता ठीक नही है, अधिकारी कहता है कि उसे ऊपर से आदेश है, ऊपर वाला कहता है कि जनकल्याण का पैसा भेजता हूँ, पैसा बीच मे गायब हो जाता है। इस लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतिम छोर पर आम आदमी और प्रथम सिरे पर सत्ताओं की उपस्थिति है, और ये बीच क्या है जहॉ पर सब कुछ विलुप्त हो जाता है इसका उत्तर ब्रह्मा भी नही दे सकेंगे। समस्या निगरानी की है? दायित्व को निभाने की है? लोभी प्रवृत्ति की है? सिस्टम के गलत होने की है? इसका पता किसी के पास नही है। सभी को बरगलाया जाता है कि हमारा तंत्र मजबूत है, दुर्ग के समान मजबूत है, किंतु बहुत चतुराई से दुर्ग के उन चोर दरवाजों का जिक्र हटा दिया जाता है जिसका उपयोग कर के क्वात्रोची, एंडरसन जैसे लोग निकल भागते हैं या फिर राजा, कलमाडी जैसे लोग उन चोर दरवाजो से जनता के धन को ठिकाने लगा देते हैं।

एक सामान्य व्यक्ति के आपाधापी वाले जीवन मे इतना समय निकलने की संभावना नही है कि वो प्रत्येक ६ महिने या साल के बाद सत्ताओं के कार्य का पुनर्वालोकन करे और संतुष्ट ना होने या व्यवस्था के भ्रष्ट होने की स्थिति मे बार बार जंतर मंतरों का निर्माण कर सके और ना ही उसके पास ऐसे टूल हैं जिनका प्रयोग कर के वो चोर दरवाजों को बंद कर सके। जिन्हें राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का बोध है वो आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं या फिर सत्ताओं के प्रति उदासीन भाव रखते हुए समाज के बीच मे काम करते रहते हैं।

सामान्य व्यक्ति के अंदर विरोध करने का साहस नही होता, विरोध करने के लिये व्यक्ति का प्रसिद्ध होना या फिर पारिवारिक दायित्व का ना होना आवश्यक है। यदि कोई सामान्य व्यक्ति आमरण अनशन करता तो अब तक सत्ताधारियों की भृकुटि उस पर टेढी हो चुकी होती और कई आर.टी.आई कार्यकर्त्ताओं की तरह वो भी मृत्यु को प्राप्त हो चुका होता। सामान्य व्यक्ति का परिवार के प्रति दायित्व का बोध एक ऐसी भावना है जो उसके राष्ट्र के प्रति दायित्व के बोध को कम कर देती है, और नेताओं की विलासिता और शक्ति केंद्र मे बने रहने की इच्छा एक ऐसी लिप्सा है जो राष्ट्र के प्रति उनके बोध को खत्म कर देती है। सत्ता केंद्रो को उनके दायित्वों का बोध बनाये और जगाये रखने के लिये ये आवश्यक है कि अन्ना जैसे व्यक्तियों को अपनी सामाजिक स्वीकृति को हथियार बना कर इस गलत राह मे जाते हुए देश की दिशा को बदलने का प्रयास करना होगा और इस देश को गलत राह पर ले जाने के लिये जिम्मेदार चालकों और परिचालकों को बाहर फैंकना होगा। अन्यथा यदि ये व्यवस्था नही बदली तो आने वाली संताने पूछेंगी कि जब राष्ट्र का पतन हो रहा था उस समय आप लोग क्या कर रहे थे, तो चाहे कितना ही तर्क संगत उत्तर दिया जायेगा, वो स्वीकार्य नही होगा, क्योंकि आखिर स्थिति को सुधारने का दायित्व तो सभी का होता है, और आने वाली पीढी हमें ही दोषी ठहरायेगी।

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भ्रष्टाचारियों के कारण मेरी संक्रांति की खिचडी..

आज मकर संक्रांति है, सूर्य भगवान उत्तरायण मे जाना आरंभ करेंगे. वैसे तो खिचडी कई दिन से पक रही है, सब्जी मे बिना प्याज के मजा नही आता, और मुझे सब्जी खाने मे मजा आये, इसमे शरद पवार को मजा नही आता, तो आज भी खिचडी बनी है, ये अच्छा है कि इसमे प्याज नही डलते वरना संक्रांति पर्व की खिचडीभोज भी शासक समूह को धिक्कारने मे गुजरता. एक कौर खाता, चार गाली बकता, जीभ कटती तो आठ बकता. नेता ने तो सुनना बंद कर दिया, वो गुहार नही सुनता तो गाली क्या सुनेगा? वो तो आजकल इठलाती हुई महिला सी दिखती पत्रकार के, या फिर एक दैत्य जैसा, ब्रह्म भोज की डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले पत्रकार के फोन सुनता है, खिचडी खाई तो लगा कि इस पर अभी तक खाद्य मंत्री की नजर क्यों नही पडी? ये कैसे सुलभता से प्राप्त हो रही है, आखिर उसकी संसद की थाली १३ से १८ रुपये की हो गयी तो उसका पैशाचिक दृष्टि प्रभाव मेरी थाली पर क्यों नही पडा? फिर सोचा खा लूं, कहीं नेता को पता चला तो खिचडी मे पडने वाले सभी पदार्थो के मूल्यो की जॉच करा देगा और फिर पानी, नमक, हल्दी, प्रेशर कूकर के दाम बढा देगा, और चूल्हे की अग्नि, प्रेशर कूकर के अंदर के भाप के दबाव पर एन्वायरमेंट टैक्स, थाली मे परोस कर खाने पर सर्विस टैक्स और हाथ से खाना मुँह तक पहुंचाने पर यातायात टैक्स लगा देगा.

खिचडी खतम हुई तो पेट ने गाली दी, कब तक खायेगा ये? एक ही चीज पचाता रहूंगा क्या? उसे भी समझाया, जो मिल रहा है वही पचा ले, नेता भी तो पिछले ६३ साल से गरीबो को पचा रहा है, उसने तो डकार तक नही मारी, फिर तुझे खिचडी पचाने मे क्या समस्या है? वो भी गरीब जनता की तरह भयभीत चुप्पी लगा कर बैठ गया. पिछले चुनाव मे नेता भीगी बिल्ली जैसा निरीह, दयनीय, शोषित, पीडित, जख्मी, पिटा छिता, गिरता पडता, कुर्ते पाजामे मे पार्टी का स्टिकर लगाये, ऑखो मे ऑसू लिये (बिना प्याज वाले, मेकअप वाले), इज्जत बचाने की दुहाई लगाता हुआ वोट मांगने आया था, लोगो को बहुत दया आई थी, लेकिन जीत की सूचना से आज तक उसके घर की तरफ से हवा भी हमारे मोहल्ले तक नही आई. हमारे मोहल्ले के लोग कई बार उस ओर गये, गालियॉ बकते हुए वापस आये. मैने जाना उचित नही समझा, खिचडी खाई थी, यदि उसे मेरा पेट थोडा भी भरा हुआ दिखता तो वो प्रपंच रच देता, और किसी इन्वेस्टिगेशन एजेंसी को मेरे भरे पेट की जॉच का भार सौंपता और खिचडी के साथ मेरी ऑते भी बाहर निकाल लेता. मै तो भारतीय जनता हूं, इसलिये आशावादी हूँ. आशा कर रहा हूँ कि मेरे खाने की थाली भी संसद की थाली की तरह १८ रुपये मे मिल जाये. अभी तो १८ रुपये मे प्याज का छिलका नही मिल रहा, थाली कहॉ से मिलेगी?

पिछले दिनो मेरे जैसे अन्य गरीब भारतीयों के यहॉ एक छोटा युवराजी नेता आ जा रहा था, वो आता था तो घर के एक आदमी का एक टाइम का खाना खा कर चला जाता था, फिर अखबारो मे छपता था कि उसने गरीब के यहॉ खाना खा कर देखा कि गरीबो को कितनी तकलीफ है, लेकिन कुछ दिन बाद पता चला कि उसने टुण्डे कबाब भी खाये हैं, मेरे यहॉ के खाने की हालत देखने के बाद उसने मेरी समस्या का ये हल निकाला कि गरीब के यहॉ खाना खाने से अच्छा है कि टुण्डे मियॉ के कबाब खाये जायें. मुझे मेरी गरीबी का ऐसा हल समझ नही आया. खैर मुझे तो कबाब नही मिल सकते लेकिन मुझे खिचडी की चिंता है, अधिकारिक संक्रांति खिचडी तो आज बनी है, लेकिन अनाधिकारिक संक्रांति की खिचडी तो मै कई दिन से खा रहा हूँ, सरकार मुझ से कई दिनो से पर्व मनवा रही है, मै सरकार का बहुत आभारी हूँ. चलता हूँ, टुण्डे कबाब वाली खबर फिर से पढूंगा, बहुत दिन हुए, कबाब की फोटो भी नही देखी.. आप लोग भी पर्व मना कर ऊब जायें तो टुण्डे कबाब की खबर पढ लेना, पढने मे ही कबाब का मजा आ जायेगा…

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भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध..

कॉमनवेल्थ खेल खत्म हुए २ महिने से ज्यादा हो गया, भारतीय जनमानस के ८०,००० करोड रुपयो का कुछ पता नही चला है.. और जो पता चला है वो ये कि देश मे एक नयी प्रणाली विकसित हो गई है, जो मिल जुल कर काम कर रही है, इसमे पत्रकार हैं, नेता हैं, व्यवसायी हैं, अधिकारी है. एक घेरा बना हुआ है जिसके बीच मे भारतीय जनमानस है और चारो ओर से इन सुरसाओ ने अपना मुँह खोला हुआ है.. भारतीय जनमानस को इतना असहाय और शासको का इतना अधिक नैतिक और चारित्रिक पतन आज तक नही सुना.. चोर शासको ने प्रणाली के अंदर स्वयं को बचाने के लिये पहले वैधानिक चोर दरवाजे बनाये, और फिर अपने को बेनकाब कर सकने वाले अन्य समूहो के प्रतिष्ठित सौदागरो को जिन्हे वो पत्रकार और अधिकारी कहते हैं, उन्हे भी अपनी प्रणाली का हिस्सा बना लिया, आम जनमानस को ठगा गया और ठगे गये पैसे की बंदरबॉट हुई, जिन्हे राष्ट्र हित सर्वोपरि रखना चाहिये था उन्होने स्वयं के और अपने स्वजनो के लाभ हेतु मौन धारण किया.

सत्तायें अब जनमानस के लिये कम और स्वयं के विकास के लिये ज्यादा ध्यान देने लगी, बोफोर्स, कॉमन्वेल्थ खेल, आदर्श सोसायटी, चारा, जमीन, खनन, पी एफ.. एक अंतहीन सारणी बनने लगी है लेकिन जब जॉच और सजा को देखते हैं तो एक पंक्ति भी नही भरती.. लोभ सिर्फ सत्ता तक सीमित नही रह गया है, लोभ सत्ता के साथ साथ आर्थिक सम्पन्नता का भी हो गया है. और सत्ता सुख सतत रूप से मिलता रहे, इसके लिये पत्रकार, व्यवसायियो के साथ मिलकर नेताओ ने ये प्रणाली विकसित की. पिछले कुछ दशकों से नेताओ के चरित्र और कार्यो का विश्लेषण करें तो लगता है कि सत्ता काजल की कोठरी हो गई है, जो उजला गया वो काला हो कर निकला, जो काला गया तो भुजंग हो कर निकला, और कोठरी मे जिसका दम घोटा गया वो आम जनमानस था. जो सफेद होने का ढोंग दिखाते हैं, वो मौन हैं और अपने स्वजनो को लूट खसूट की मौन स्वीकृति दे कर सत्ता सुख मे लीन हैं. सत्ताधीशो के लिये ५ साल अपनी सरकार चलाना एक मात्र उपलब्धि हो गया. राष्ट्र की उन्नति अब सत्ताओ के लिये कोई विषय नही है, सत्ता वापसी अब ज्यादा चिंता का विषय है, कागजी योजनाओ को भिन्न टीवी चैनलो पर प्रसारित कर के आम जनता को मरिचीका दिखाने का भार पत्रकारो ने लिया, लूट से अर्जित की गई संपत्ति से अरबपति बन कर लोगो को बताया गया कि भारत मे अरबपतियों की संख्या मे बढोत्तरी हो रही है, अधिकारियों को सत्ता सुख, भ्रष्टो को ऊंचे पदो और लूट का हिस्सा दे कर उन्हे उनके कर्तव्यो से विमुख किया गया और इस प्रकार ये भिन्न भिन्न श्रेणी की सुरसाओ से मिलकर बनी प्रणाली ने सत्ताओ पर बैठे लुटेरो की राह आसान कर दी.

लोकतंत्र की असहायता ये है कि उसके पास अधिकार ५ वर्ष मे एक बार आता है, और बाकि समय यदि वो चाहे तो भी कुछ नही कर सकता, लोकतंत्र की अंतिम कडी एक साधारण मनुष्य को इतना अक्षम कर दिया है कि वो एक दिन के विरोध के लिये भी अपने कार्य को नही छोड सकता, यदि उसको विरोध करने के लिये कहा जाये तो वो सहम जाता है और ऐसे डरता है जैसे उसे कोई चोरी करने के लिये कहा जा रहा हो. इस प्रणाली के रचियता और रक्षको का आत्मविश्वास इतना अधिक है कि जो उन पर उंगली उठाये वो उस संस्था (कैग) को या तो गलत बताते हैं या फिर जो उन पर उंगली उठा सकती है (जेपीसी) वो उसे बनने से रोकने के लिये संसद के पूरे सत्र का बलिदान देने से भी नही चूक रहे. भारतीय लोकतंत्र का ये नया शत्रु अपराधियों के राजनीतिकरण से भी अधिक भयावह है, एक अपराधी का आम जनमानस को पता होता है कि वो अपराधी है, लेकिन इस प्रणाली मे एक साधारण व्यक्ति किस पर संदेह करे, यहॉ तो जिसे खेत के रक्षक का काम करना चाहिये था वो खुद फसल को खा कर खेत बेचने के सौदे कर रही है,

राष्ट्र को यदि फिर से ठीक मार्ग पर लाना है तो इस देश को खाने वाली इस प्रणाली मे बसे एक एक हिस्से को काट कर बाहर निकालना होगा.. सत्ता से अपेक्षा करना व्यर्थ है, कोई सत्ता लोलुप स्वयं के भाग निकलने के मार्गो को बंद करेगा, ये आशा करना ही बेकार है. और पत्रकार, व्यवसायियो की जमात के मुँह लगा खून का स्वाद वो इतनी जल्दी भूल जायेंगे, इसकी संभावना भी कम ही लगती है. परिवर्तन तभी आ सकता है जब हम स्वयं एक ऐसी प्रणाली विकसित करें जिसके सामने कोई भी व्यक्ति या समूह भ्रष्ट आचरण करने से घबराये, ये प्रणाली संवैधानिक रूप से बनाई जाये या फिर सामाजिक रूप से, लेकिन यदि इसे जल्दी विकसित नही किया गया तो सत्ताधीशो, व्यवसायी, पत्रकार और अधिकारियो का ये गिरोह व्यक्ति, समाज, राष्ट्र को बेच कर खा जायेगा. राष्ट्र की अधोगति के लिये उत्तरदायी इस गिरोह के विरोध के लिये कुछ लोग प्रयास रत हो गये हैं, शासको से मात्र उपेक्षा और आश्वासन ही मिल सकते हैं, सत्ता और शासको को नियंत्रित करने के लिये कोई ना कोई सामाजिक / संवैधानिक व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है, इस परिवर्तन के लिये यह आवश्यक है कि पहले संगठित हुआ जाये और फिर एक प्रणाली विकसित की जाये जिस से सत्ता मे भ्रष्टाचार के विरुद्ध भय उत्पन्न किया जा सके और भ्रष्टाचारियों को नियंत्रित कर के उन्हे सजा का प्रावधान किया जा सके.
ऐसी ही एक प्रणाली के विकास के लिये आपका फेसबुक पर स्वागत है, भ्रष्टाचार से त्रस्त हो कर उसके विरोध के लिये एक समूह India Against Corruption बनाया गया है, जिसका लिंक इस प्रकार है.

http://www.facebook.com/home.php#!/IndiACor

कृपया इस मे भाग ले कर अपने विचारो से अवगत करायें..
धन्यवाद.

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नीरा राडिया की विभिन्न भ्रष्टों से हुई बातचीत (www.bhadas4media.com से साभार)

मैं पीएम के घर से निकलते ही आजाद से बात करूंगी : बरखा दत्त
बरखा दत्त – ग्रुप एडिटर, एनडीटीवी चैनल (अंग्रेजी)

नीरा- हाय, क्या मैंने तुम्हें जगा दिया?
बरखा- नहीं नहीं, मैं उठ गई थी, पूरी रात ही हो गई। मामला वैसे ही अटका हुआ है।
नीरा- हां, सुनो, वो उनसे सीधी बात करना चाहते हैं। अब यही समस्या है।
बरखा- हां तो, पीएम उसके (दयानिधि मारन के) मीडिया में चले जाने से खफा हैं।
नीरा- लेकिन बालू ने ऐसा ही किया ना.. करुणानिधि ने उसे ऐसा करने को नहीं कहा था।
बरखा- अच्छा, ऐसा क्या।
नीरा- उससे कहा गया था कि वह आ जाए और कांग्रेस से बात करे।
बरखा- और उसने सब खुलासा कर दिया।
नीरा- हां, मीडिया बाहर ही मौजूद था।
बरखा- हे भगवान, तो अब क्या? मुझे उन्हें क्या बताना है? बताओ, मैं वो बात कर लूंगी?
नीरा- मैंने उनकी (करुणानिधि की) पत्नी और बेटी से लंबी बात की। उनकी समस्या यह है कि वे (कांग्रेस नेता) सीधे करुणानिधि से बात करना चाहते हैं। लेकिन वे ऐसा मारन और बालू के सामने नहीं कर सकते। उन्हें करुणानिधि से सीधी बात करने की जरूरत है। कांग्रेस के पास तमिलनाडु में बहुत से नेता हैं, जो करुणानिधि से सीधी बात कर सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या अझागिरी के समर्थक हैं, जो मारन को कैबिनेट में लिए जाने के खिलाफ हैं और अझागिरी को राज्य मंत्री का दर्जा देने से असंतुष्ट हैं।
बरखा- मुझे पता है।
नीरा- कांग्रेस को करुणानिधि को यह बताने की जरूरत है कि हमने मारन के बारे में कुछ नहीं कहा।
बरखा- ओके, मुझे उनसे फिर बात करने दो।
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बरखा- हाय नीरा
नीरा- बरखा, हाय, मैंने उनसे फिर बात की और वे यह मान रही हैं कि उन्हें इस तरह सूची नहीं भेजनी चाहिए, .. लेकिन मुद्दा यह है कि विभागों के बंटवारे पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई।
बरखा- क्या वाकई?
नीरा- बरखा, मुझे पता चला है कि कांग्रेस किसी से बात कर रही है लेकिन भगवान जाने डीएमके में वह कौन है।
बरखा- हां, मारन ही होना चाहिए।
नीरा- हां, अब उन्हें यह करने की जरूरत है कि उन्हें कनीमोझी से बात करनी होगी ताकि वह अपने पिता से चर्चा कर सकें। यहां तक कि प्रधानमंत्री के साथ चर्चा में वही दुभाषिए की भूमिका में थी, लेकिन वह सिर्फ दो मिनट की ही बातचीत थी।
बरखा- ओके
नीरा- वो कह रही है कि कोई वरिष्ठ नेता जैसे गुलामनबी आजाद.. क्योंकि उनके पास बातचीत का अधिकार है।
बरखा- ठीक है। मैं आरसीआर (प्रधानमंत्री निवास) से निकलते ही आजाद से बात करूंगी।
बरखा- देखो, क्या हुआ कि कांग्रेस में सभी शपथ ग्रहण समारोह में व्यस्त थे। तो मैं किसी से बात नहीं कर पाई। अब सब खत्म हुआ है तो मैं फोन करती हूं।
नीरा- कनीमोझी अभी चेन्नई पहुंची हंै। मेरी अभी बात हुई है।
बरखा- दया कहां है? कहां है मारन?
नीरा- दया शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आया क्योंकि उसे वापस बुला लिया गया। वह करुणानिधि को बताने गया है कि उसे अहमद पटेल ने शपथ के लिए बुलाया था। लेकिन नेता (करुणानिधि ) कह रहे हैं कि इसके लिए उसे कांग्रेस में शामिल होना पड़ेगा।
बरखा- (हंसते हुए) तो अब?
नीरा- तो राजा ही बचा है जिसे शामिल होना चाहिए। और वो 8.40 बजे की फ्लाइट से आ रहा है..
बरखा- ओके

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मैंने दोनों भाइयों के बीच बातचीत की कोशिश की थी :प्रभु चावला
प्रभु चावला : संपादक, भाषाई प्रकाशन, इंडिया टुडे

नीरा- हाय प्रभु!
प्रभु- हां बताओ
नीरा- कुछ नहीं, मैं सिर्फ आपसे स्थितियां समझना चाहती थीं। प्रभु- किस बारे में? नीरा- इस महान ऐतिहासिक फैसले के बारे में क्या विचार है।
प्रभु- कौन-सा, बॉम्बे वाला?
नीरा- जिसने परिवार को देश हित के ऊपर खड़ा कर दिया।
प्रभु- देखिए जहां दोनों भाई (मुकेश और अनिल अंबानी) शामिल होंगे, वहां देश को भी शामिल होना पड़ेगा?
नीरा- शायद यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा।
प्रभु- लेकिन दोनों भाई एक-दूसरे से बात नहीं करते। ऐसा कोई है भी नहीं जो दोनों को बात करने के लिए मजबूर कर दे।
नीरा- वो तो होगा नहीं, प्रभु तुम भी जानते हो।
प्रभु- मैंने कोशिश की थी, नहीं हुआ। वो (मुकेश अंबानी) कभी जवाब नहीं देता। इसलिए मैंने उसे फोन करना बंद कर दिया है। उसको मैंने 15-20 दिन पहले मैसेज भेजा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद मैंने मैसेज नहीं भेजा। फैसला आने से पहले मैं उसके बारे में मालूम करना चाहता था।
नीरा- क्या फैसला उसके खिलाफ आ रहा है।
प्रभु- हां, लेकिन इतना घमंडी है ना, उसके साथ क्या करें? दोनों भाइयों को मैं समझ नहीं पाता।
नीरा- प्रभु मुझे एक बात बताओ। फैसला फिक्स है ना?
प्रभु- देखो इस देश में, दोनों के पास फिक्स करने की क्षमता है। छोटा भाई पैसे कम खर्च करता है, कंजूस है सबसे ज्यादा। लेकिन वो बड़े भाई के मुकाबले ज्यादा मोबाइल है। बड़ा भाई तो धीरूभाई की तय की हुई सीमा से आगे जाना ही नहीं चाहता। वो उन्हीं लोगों पर निर्भर है जिन्हें धीरूभाई ने बनाया। अब वे किसी काम के नहीं। अनिल ने नए सूत्र बनाए हैं, नए संपर्क, नई सोच विकसित की है। यदि उसको कुछ.. क्योंकि आज-कल सब फिक्स हो जाता है। यदि सुप्रीम कोर्ट में उलट-फेर हो गया तो वह सालों के लिए बर्बाद हो जाएगा। यदि उसके पक्ष में फैसला नहीं आया तो? तब तो वह खत्म ना?
नीरा- कोर्ट के आर्डर में, 328 पन्नों में, मैं आपको दे सकती हूं। मैं बताऊं डुअल टेक्नोलॉजी मामले में जो वाहनवती ने करवाया, राजा ने डॉ. शर्मा को ट्राई चेअरमैन बनाया। मैं गारंटी देती हूं उसमें वही पैन ड्राइव इस्तेमाल की गई होगी।
्र
प्रभु- जिस तरह वह (मुकेश) सुप्रीम कोर्ट जा रहा है, इससे ज्यादा मैं तुमको कुछ नहीं बता सकता। जिन लोगों को वह इस काम के लिए इस्तेमाल कर रहा है, वे भरोसे के काबिल नहीं हैं। तो इन कमजोर कड़ियों को मजबूत करना है ना?
नीरा- अनिल अपना लगा होगा, अपने लोगों के जरिए, डीएमके के जरिए, अपने चीफ जस्टिस के साथ।
प्रभु- नहीं, चीफ जस्टिस केरल का है। मुकेश जिस तरीके से चल रहा है, मैं कहना चाहता हूं कि वह सही नहीं है।
नीरा- मैं बात करूंगी थोड़ी देर में, मैं बोलूंगी कि वो (मुकेश अंबानी) आपसे बात करे।
प्रभु- मैंने उसे मैसेज भेजा था। दस बार मैसेज भेजा, उसने जवाब नहीं दिया। मैं इस मामले में पड़ना नहीं चाहता.. क्योंकि मेरा बेटा अनिल के लिए काम करता है। मैं उससे कुछ भी बात नहीं करना चाहता। लेकिन सुन तो लेता हूं, इधर-उधर पोलिटिकल लोगों से। लेकिन वह उसके लिए नहीं खड़ा हो रहा है। मेरा बेटा इस केस में शामिल नहीं है। वह इस केस में मेरे बेटे पर भरोसा नहीं करता है। अनिल को मेरे बेटे पर भरोसा नहीं है।
नीरा- आपका बेटा किसके साथ है?
प्रभु- वह अनिल के लिए काम करता है। उसकी अपनी वकालत कंपनी है। वह कई लोगों के लिए काम करता है। अनिल की मोबाइल कंपनी ने उसे काम दिया था। इस केस में वह उसके साथ नहीं है। लेकिन इधर-उधर से चीजें तो पकड़ ही लेते हैं सब। मेरे पास जो जानकारी है, वह कानूनी क्षेत्र के सूत्रों से मिली है। एक बार जब तुम बताओगी कि प्रभु, लंदन के लोगों से मिली जानकारी के आधार पर तुम्हारे बारे में कुछ कह रहे थे तो वो समझ जाएगा।
नीरा- उन्हें बताऊंगी।
प्रभु-छोटा भाई बड़ा हरामी है।
नीरा-हरामी तो है लेकिन हर वक्त हरामीपना नहीं चलता ना?

एनडीटीवी पर बरखा दत्त का बयान

दिलीप पडगांवकर (टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक) ने पूछा : जब द्रमुक और कांग्रेस मंत्रिमंडल गठन पर पहले ही बातचीत कर रहे थे, तो आपको संदेशवाहक बनने की क्या जरूरत थी?
बरखा : एक पत्रकार की हैसियत से मैं तो केवल और जानकारी हासिल करने के लिए राडिया से बात कर रही थी।
संजय बारू (बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादक)- आपनेखुद कहा कि आप राडिया का संदेश अहमद पटेल तक पहुंचा देंगी?
बरखा : वह तो मैंने उनका विश्वास जीतने के लिए झूठा वादा किया था।
संजय बारू – आपने यह भी कहा कि आपने राजा के बारे में गुलाम नबी आजाद से बात कर ली है?
बरखा : मैंने झूठ बोला था।
मनु जोसेफ (ओपेन मैगजीन के संपादक) – सरकार के गठन में कॉपरेरेट पीआर का दो पार्टियों से बातचीत करना क्या दशक की सबसे सनसनीखेज खबर नहीं थी? आपने इसे रिपोर्ट क्यों नहीं किया?
बरखा – हां, मैं सही फैसला नहीं ले पाई, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि मैं किसी भी तरह सत्ता की दलाली या भ्रष्टाचार में लिप्त थी।
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हेडलाइन्स टुडे पर प्रभु चावला की सफाई

मैं मुकेश अंबानी को वैसे ही सलाह दे रहा था जैसे ‘द हिंदू’ के संपादक श्रीलंका सरकार को देते हैं
हरतोष सिंह बल (ओपन पत्रिका के राजनीतिक संपादक) : आप मुकेश अंबानी को गैस के बंटवारे पर फैसले के बारे में चेतावनी क्यों देना चाहते थे?
चावला : नहीं, मैं तो इस बारे में केवल उनसे बात (प्रोब) करके जानकारी लेना चाहता था।
बल : आपने टेप की स्क्रिप्ट में बदलाव कर दिया है। टेप में चेतावनी (फोरवार्न) शब्द है जबकि आपने स्क्रिप्ट में उसे बदल कर गहराई से बात करना (प्रोब) कर दिया?
चावला : नहीं आपका आरोप सरासर निराधार है। मैंने चेतावनी शब्द का प्रयोग ही नहीं किया।
एम जे अकबर (इंडिया टुडे के संपादकीय निदेशक): लेकिन आप मुकेश अंबानी को बिना मांगे सलाह क्यों देना चाहते थे?
चावला – मेरा मानना है कि मुके श और अनिल के झगड़े से पूरा देश प्रभावित हो रहा था। इसीलिए मैं उन दोनों को ही सलाह देना चाहता था कि उन्हें देश हित में समझौता कर लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। वैसे भी मैं अपने विचारों को लेकर अपने दर्शकों और पाठकों के अलावा और किसी के प्रति उत्तरदाई नहीं हूं। सभी संपादक अपने कॉलम में सलाह देते हैं। मैं तो वैसे ही सलाह दे रहा था जैसे एन राम श्रीलंका की सरकार को देते हैं।
एन राम (द हिंदू के संपादक) – मुझे भरोसा है कि प्रभु चावला ने कुछ भी गलत नहीं किया। बल्कि उन्हें तो सफाई देने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में बुलाया ही नहीं जाना चाहिए था।
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वीर सांघवी : एडवाइजर, हिंदुस्तान टाइम्स

वीर सांघवी : आपको पता है, मारन ने सोनिया से मुलाकात नहीं की।
नीरा : वे नहीं मिले। वीर : वे सोनिया से नहीं मिलेंगे। वे वहां थे। वे कहते हैं कि हमें आधिकारिक प्रवक्ता के रूप में नहीं देखा जा रहा है। उन्होंने थोड़ी देर पहले ही फोन किया था। मैंने आपका मैसेज देखा। वह हर आधे घंटे में गुलाम नबी आजाद को फोन कर नई मांगें पेश कर रहे हैं।
नीरा : हम्म्म्म
वीर : तो उन्होंने कहा कि वे दो दिन इंतजार करेंगे। मारन गुलाम नबी आजाद को लगातार फोन कर कह रहे हैं, हमसे बात करो, हमसे बात करो।
नीरा : काफी दिलचस्प है। मुझे गुलाम नबी से बात करके काफी अच्छा लगेगा। और आपको?
वीर : मैंने अहमद (पटेल) से बात की है। गुलाम नबी अहम शख्स नहीं हैं। अहमद प्रमुख व्यक्ति हैं।
नीरा : ठीक
वीर : हां, इसलिए अहमद कहते हैं कि गुलाम नबी, मारन से बात कर रहे हैं। लेकिन गुलाम हमारे आधिकारिक व्यक्ति नहीं है और हम मारन के साथ गंभीरता से बात नहीं कर रहे हैं। जहां तक उनका सवाल है, उन्होंने पांच अहम मंत्रालयों की मांग की है। यह एक मूर्खतापूर्ण और गैरवाजिब मांग है। अहमद कहते हैं, ‘हमने मारन से कह दिया है कि हम करुणानिधि से डील करेंगे, इसलिए वे लौट गए।’ वे कहते हैं, हमने एक वाजिब ऑफर दिया है, करुणानिधि का हम काफी सम्मान करते हैं, हम उनके साथ डील करना चाहते हैं। मारन के लिए हमारे मन में कोई सम्मान नहीं है।
…. …. …. ….

नीरा : लगता है कि वे अभी भी मारन को लेने के लिए काफी दबाव में हैं।
वीर : यह दबाव कहां से है?
नीरा : यह स्टालिन और उसकी बहन सेल्वी की तरफ से है। मुझे लगता है मारन ने स्टालिन की मां दयालु को 600 करोड़ रुपए दिए हैं।
वीर: इस तरह के दबाव के आगे बहस करना मुश्किल है।
नीरा : हां, मैं भी ऐसा ही सोचती हूं।
वीर : जब तक कि मारन को कैबिनेट मंत्रालय न मिले।
नीरा : हां, लेकिन मैं नहीं सोचती कि वे परिवार के तीन सदस्यों को मंत्री बनाएंगे। बहुत खराब संकेत जाएगा।
…………

वीर : हाय नीरा! नीरा : हाय वीर, तुम दिल्ली में हो या..
वीर : मैं जयपुर में हूं। आज शाम को लौट रहा हूं।
नीरा : मैं चाहती हूं.. मुझे नहीं मालूम कि आप कांग्रेस में किसी से पता करने की स्थिति में हैं या नहीं। मैं अभी कनिमोझी से मिली थी।
वीर : मैं सोनिया से मिलने वाला था, लेकिन यहां फंस गया। अब कल से पहले निकलना मुमकिन नहीं। मेरी राहुल से मुलाकात है, फिर भी कहो?
नीरा : नहीं, मैं तुम्हें बताऊंगी कि वे गलत व्यक्ति से बात कर रहे हैं और यह बात वे समझ नहीं पा रहे हैं। इसलिए नहीं कि मैंने मारन को अलग कर दिया। असल में करुणानिधि ने मारन को बातचीत के लिए नियुक्त नहीं किया है। अब आप जानते हैं कि यह राजनीतिक अस्थिरता जैसी स्थिति है, जहां कैबिनेट..
वीर : फिर मारन सुर्खियों में क्यों हैं। वे सभी उनसे नफरत करते हैं।
नीरा : हुआ यह कि मारन ने कांग्रेस को यह संकेत दिया है कि वे राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का ही पद स्वीकार करेंगे। पर यह बात आप मुझ पर छोड़ दो।
सब ठीक हो जाएगा। अभी कांग्रेस इस बात को समझ नहीं पा रही है।
वीर : उन्हें किससे बात करनी चाहिए।
नीरा : उन्हें सीधे करुणानिधि से, कनिमोझी से बात करनी चाहिए।
वीर : सोनिया ने कल उनसे बात की।
नीरा : नहीं, उन्होंने बात नहीं की। केवल प्रधानमंत्री ने बात की और वह भी तब, जबकि कनिमोझी उनके लिए दुभाषिए का काम कर रही थीं। बातचीत बहुत संक्षिप्त थी। चलो इस मसले को सुलझाएं। इसमें कुछ है नहीं।
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हैडलाइन्स टुडे पर वीर सांघवी ने कहा

वीर सांघवी (हैडलाइंस टुडे चैनल पर)

एम जे अकबर -आपने नीरा राडिया से हिदुस्तान टाइम्स में छपने वाले अपने कॉलम के लिए डिक्टेशन क्यों लिया?
सांघवी – मैं उसे केवल एक सूत्र की तरह इस्तेमाल कर जानकारी इकट्ठा कर रहा था।
एन राम – आपने उससे मिली जानकारी अपने कालम में हूबहू क्यों इस्तेमाल की?
सांघवी – अगर लोगों को लगता है कि मैंने गलती की तो मैं माफी मांगता हूं। मुझे उम्मीद है कि कांट-छांट कर जारी इस टेप के आधार पर लोग मेरे बारे में अपनी धारणा नहीं बदलेंगे। मेरा जमीर साफ है, लेकिन जो कुछ हुआ उसके बारे में मुझे बेहद अफसोस है। मैं भविष्य में और सावधान रहूंगा।
राम- लेकिन आपको राडिया का संदेशवाहक बनने की क्या जरूरत थी?
सांघवी – मैं तो राडिया से और जानकारी पाने की आशा में केवल राजनीतिक गपशप कर रहा था।
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रतन टाटा : टाटा समूह के चेअरमैन

नीरा : एटीएंडटी ने अनिल अंबानी से बात करना स्थगित कर दिया है।
रतन टाटा : क्या वाकई?
नीरा : हुआ यह कि मुकेश ने अपने अमेरिकी वकील के जरिए उन्हें एक पत्र भिजवाया, जिसमें कहा गया था कि हमारे पास राइट ऑफ रिफ्यूजल है। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे इसकी जांच कर रहे हैं और आगे बढ़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। यह कहीं खत्म नहीं होगा। अब वह अपनी पावर कंपनी के लिए चाइना पावर की बात कर रहे हैं। उन्हें पैसे जुटाने हैं।
रतन : चाइना पावर इस लेन-देन में पड़ेगी, मुझे शक है, क्योंकि वे कंजर्वेटिव हैं।
नीरा : लेकिन उसके पास है। टेलीकॉम स्पेस के लिए फ्रांस टेलीकॉम ने उन्हें नहीं कह दिया था। एटीएंडटी ने भी नहीं कहा। एमटीएन ने भी नहीं कहा। मुझे लगता है यह टेलस्ट्रा है।
रतन : ऑस्ट्रेलिया का?
नीरा : उन्होंने भी नहीं कहा है। इसलिए क्यूटेल के अलावा अब बात करने के लिए और कोई भी नहीं है। यह मुश्किल है।
रतन : तुमने शिवा (शंकरन) से बात की?
नीरा : हां, शिवा कोर्ट चला गया है। उसे 25 तारीख मंजूर नहीं है। हां, अब राजा ने मुझे बताया है कि वे उसे बिना स्पैक्ट्रम के लाइसेंस देना चाहते हैं। हां, मैं आज राजा से मिली थी। मैं उनसे मिलने गई थी और वे ठीक हैं। वे खुश हैं। चीफ जस्टिस से हरी झंडी मिलने के बाद वे खुश हैं। मैंने उन्हें बताया है कि एक पत्र उनके पास आ रहा है, केके का, यू नो। लेकिन वे नहीं समझ पाए कि यह पत्र क्यों है, चैक क्यों नहीं। मैंने कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि इसकी एक प्रक्रिया है और इसे आपको समझना होगा।
रतन : क्या उन्हें (राजा को) मालूम है कि कोई और भी उन पर निशाना साध रहा है?
नीरा : ताजा अफवाह यह है कि उनका कनिमोझी के साथ अफेयर है। बात सही नहीं है।
रतन : हां, पर ये फैलाई किसने?
नीरा : और कौन हो सकता है मारन ने। लेकिन यह सब राजा की वजह से है। जब कभी मीडिया उनसे या किसी और से मिलने आता है, वे कहते हैं कि कनि के प्रति उनके दिल में कितनी हमदर्दी है। वे हमेशा उनकी बात करते हैं, चाहे वे कितने ही दुखी क्यों न हों। उनका संकेत यह होता है कि वे उन पर जान छिड़कते हैं, लेकिन कनि उन्हें भाव नहीं देती। सभी उन्हें दो दिल एक जान कहकर उनके बारे में अफवाह उड़ाते। वे इस तरह के बेवकूफ इंसान हैं, जो नहीं समझता कि उनकी पत्नी उन्हें क्यों पीटना चाहती है। वे आज मुझे कह रहे थे, ‘तुम यह नहीं कह सकती कि मैं शरमा रहा हूं।’ मैंने कहा, ‘आई एम सॉरी, पर जरा अपनी आंखों को देखिए।’ वे इस तथ्य को छिपा नहीं सकते कि उनकी आंख लड़ गई है। और कनि मुझसे कहती हैं, ‘मुझे इस आदमी से दूर रखो।’
नीरा : आप अब भी मिडिल ईस्ट में हैं?
टाटा : हां। मेरी तो एक ही चिंता है कि मारन पूरी तरह से राजा के पीछे पड़ गए हैं। उम्मीद करता हूं राजा लड़खड़ा या फिसल न जाए या..
नीरा : नहीं, ऐसा नहीं है क्योंकि चीफ जस्टिस ने बयान जारी किया है कि किसी मंत्री ने हाईकोर्ट जज को फोन नहीं किया।
टाटा : क्या वाकई?
नीरा : चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने यह बयान जारी किया है। तो बात साफ हो गई है। जो भी हो, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था और मारन अब थोड़े मूर्ख नजर आ रहे हैं।
टाटा : मुझे तो अचरज होता है कि राजा के लिए तुमने जो कुछ किया उसके बाद वे यह खेल खेल रहे हैं।
नीरा : राजा ने बड़ी चतुराई से पूछा, ‘नीरा, कोर्ट के आदेश के खिलाफ मैं कैसे जा सकता हूं?’ मैंने कहा, ‘हैलो, मिस्टर राजा, आप कोर्ट के खिलाफ जा सकते हैं। आपको अदालत के कहे मुताबिक चलने की जरूरत नहीं है क्योंकि 4.4 (मेगाहट्र्ज) के लिए लाइसेंस है और इसकी व्याख्या आपको निकालनी है।’
टाटा : लेकिन अब नए एटॉर्नी जनरल …
नीरा : नहीं रतन, सॉलिसिटर जनरल अच्छे आदमी है, गोपाल सुब्रमनियम। वे ही व्याख्या करेंगे। मैं उनसे मिलने वाली हूं। मैंने उन्हें मैसेज भेजा था और उन्होंने कहा कि वे जब फ्री हो जाएंगे और घर में होंगे तो साढ़े पांच-छह बजे फोन करेंगे। ..हकीकत में वे उनसे (अनिल अंबानी ग्रुप) से घृणा करते हैं। मुझे लगता है राजा एजी को अपने पक्ष में करने में लगे होंगे। अनिल के लिए 6.25 (मेगाहट्र्ज) सिर्फ इसलिए करेंगे ताकि वे अपनी कंपनी में एटी एंड टी को शामिल कर सकें। उन्हें इक्विटी पार्टनर की जरूरत है वरना जो कर्ज का बोझ उन्हें मिला है उससे उबर नहीं पाएंगे।
टाटा : इस सब का पर्दाफाश क्यों नहीं हुआ?
नीरा : रतन, उन्होंने मीडिया को खरीद लिया है। मीडिया पर वे अपनी खरीदी की ताकत आजमा रहे हैं। मीडिया पर खर्च किया जाने वाला हर डॉलर वे यह पक्का करने में लगा देते हैं कि उन्हें नेगेटिव पब्लिसिटी न मिले।
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एनडीटीवी पर वॉक द टॉक कार्यक्रम में बोले रतन टाटा

क्या राडिया के टेप से जाहिर नहीं होता कि वह किसी खास को मंत्री बनवाने के लिए दबाव बना रही हैं?
मैंने ये टेप सुने हैं। विश्वास मानिए नीरा का ही नहीं दिल्ली में आप किसी का भी टेलीफोन टैप करें तो आपको ऐसी ही बातें सुनने को मिलेंगी। किसी व्यक्ति का पक्ष बिना सुने उसे सजा नहीं देनी चाहिए। टेप लीक होने के पीछे जरूर निहित स्वार्थ हैं। यह स्वाभाविक नहीं है। इसकी जांच होनी चाहिए।
क्या आप चाहते थे कि कौन संचार मंत्री बने?
मैं केवल सबसे लिए लेवल प्लेइंग फील्ड चाहता था। मैंने कभी नहीं चाहा कि राजा मंत्री बने या कोई और.. नीरा से बातचीत में मैंने कभी सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की बात नहीं की। मैंने उसके जरिए किसी को रिश्वत नहीं दी।
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ए राजा : पूर्व दूरसंचार मंत्री

नीरा : हैलो
राजा : राजा हियर
नीरा : हाय! मुझे अभी बरखा दत्त से मैसेज मिला है। वह कहती है.. कि वह आज रात प्रधानमंत्री ऑफिस जाने वाली है। वास्तव में उसी ने मुझे बताया कि सोनिया गांधी वहां गईं थीं। वह कहती है कि उन्हें आपके साथ कोई समस्या नहीं है, लेकिन बालू को लेकर समस्या है।
राजा: …लेकिन इस पर लीडर से तो विचार-विमर्श करना होगा।
नीरा : हां, हां..उन्हें लीडर के साथ चर्चा करनी होगी। उन्हें बताना होगा.. राजा : कम से कम.वन टू वन..इसे लीडर के सामने खुलासा होने दंे।
नीरा : वन टू वन, आमने-सामने? राजा : वन टू वन। कोई सीलबंद लिफाफे में मैसेज दे कि बालू को लेकर हमें गंभीर समस्या है।
नीरा : कांग्रेस से, ठीक?
राजा : हां
नीरा : ओके। मैं उसे बता दूंगी। वह अहमद पटेल से बात कर रही है, इसलिए मैं उससे बात करूंगी।
राजा : कम से कम फोन पर तो उन्हें कहा जाए। सर, यह समस्या है..हम बहुत सम्मान करते हैं, राजा से हमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन समस्या तो बालू है।
नीरा : फिर दूसरी समस्या को आप कैसे सुलझाएंगे?
राजा : दूसरी समस्या को हम धीरे-धीरे सुलझाएंगे, क्योंकि अब लीडर नीचे आ गए हैं।
नीरा : अब लीडर तीन तक नीचे उतर आए हैं?
राजा : मैं जानता हूं। कांग्रेस के दिमाग में यह किसने डाल दिया कि अझागिरी अंग्रेजी नहीं जानते?
नीरा : नहीं.नहीं.. बात सिर्फ यही नहीं है। आगे जाकर तो वे और स्टालिन ही पार्टी चलाएंगे क्योंकि ओल्ड मैन तो सठिया गए हैं और उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है। इसलिए कांग्रेस उनके साथ बिजनेस करने में खुश ही होगी, क्योंकि आखिर नेता तो वही होंगे। वे स्टालिन को भी कंट्रोल करते हैं। और यह कि अझागिरी अपराधी है। और यह कि वह पांचवीं पास से आगे नहीं पढ़े हैं।
राजा : यह बात मैंने अझागिरी को बताई..अब अझागिरी लीडर से बात करेंगे। नीरा : नहीं, लेकिन उन्होंने भी यह बात कही.. कि दिल्ली में मैं (मारन) ही वह व्यक्ति हूं जिससे अंतत: आपको डील करना पड़ेगा, क्योंकि स्टालिन तो राज्य में ही रहेंगे।
राजा : मैं जानता हूं। मुझे पता है कि किस प्रकार का प्रचार वह कर सकते हैं।……………..नीरा : मैंने आपको एक एसएमएस भेजा था। मैं कनिमोझी से बात कर रही थी तो सोचा कि… आखिर वे यही तो कह रहे हैं कि आपको वहां होना चाहिए।
राजा : हां
नीरा : लीडर भी यही कह रहे हैं कि आपको वहां होना चाहिए, आप जानते हैं.. दलित होने की बातें आप तो जानते ही हो। द्रविडियन. पार्टी.
राजा : मेरा मामला साफ है, है न?
नीरा : आपका मामला साफ है, हां। कल रात ही आपका मामला साफ हुआ।
राजा : बात सिर्फ यह है कि मारन मेरे खिलाफ कैम्पेन शुरू कर देंगे।
नीरा : आपको अलग तरह से लड़ाई लड़नी होगी।
राजा : हूं..वे प्रेस से कह सकते हैं प्रधानमंत्री फिर आ रहे हैं..ऐसा-वैसा.. स्पेक्ट्रम..
नीरा : नहीं, नहीं..हम संभाल लेंगे.. डोंट वरी। यहां तक कि कांग्रेस को भी वह बयान देना पड़ा। मैंने सुनील मित्तल से बात की थी. क्या चंदोलिया ने आपको बताया?
राजा : हम्म्म..सुनील मित्तल को बताएं कि उन्हें राजा के साथ पांच साल और काम करना होगा।
नीरा : मैंने यह बात उनसे कह दी है। पर फिर आपको भी अनिल (अंबानी) से दूरी बनानी होगी। आपको निष्पक्ष रहना होगा।
राजा : हां, यह हम कर सकते हैं।
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तरुण दास : सीआईआई के पूर्व प्रमुख

नीरा राडिया : तरुण, यह व्यक्ति दोपहर को वहां नहीं मिला। उसे चंडीगढ़ जाना था।
तरुण दास : नहीं, कोई बात नहीं।
नीरा : तो वह कह रहा है कि शुक्रवार को काम हो जाएगा।
तरुण दास : अगर सारी चीजें हो जाती हैं, तो डील क्या होगी?
नीरा : हम्म्म्म.. जमीन?
तरुण दास : ओके।
नीरा : आपके लिए पांच एकड़ का इंतजाम मेरी जिम्मेदारी है।
तरुण दास : ओके।
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तरुण दास : मैं अभी-अभी मुंबई पहुंचा हूं।
नीरा : मुकेश (अंबानी) आपका चार बजे इंतजार कर रहे हैं?
तरुण दास: रतन (टाटा) के साथ डिनर है।
नीरा : ओह, अच्छा। क्या आप उनसे कहेंगे कि आपकी मुकेश से मुलाकात हुई?
तरुण दास : मुझे बताना पड़ेगा। मैं आपको सब-कुछ बताऊंगा।
नीरा : टेलीकॉम की लड़ाई फिर शुरू हो गई है। मैंने सुनील से पिछले हफ्ते मुलाकात की है।
तरुण दास : क्या अकेले या और भी लोग साथ थे?
नीरा : नहीं, अकेले। सुनील मित्तल। सिर्फ यह समझने के लिए कि हम कहां हैं और क्या कर सकते हैं.. रतन अभी भी उन पर यकीन नहीं करते। वे उनके साथ मिलकर कुछ भी नहीं करना चाहते। लेकिन वे नहीं समझते कि इस वक्त हमें एक-दूसरे की मदद की जरूरत है। यही बात मैंने सुनील से भी कही है। मैंने कहा कि वे राजा के साथ अक्खड़ तरीके से पेश न आएं। यही बात रतन पर भी लागू होती है। वे सुनील से हाय-हैलो भी नहीं कर सकते, यू नो। उन्हें सुनील को उनकी अब तक की उपलब्धियों का श्रेय देना ही चाहिए।
तरुण दास : आपने सुनील को कैसे खोजा? आपको इसका ख्याल कैसे आया?
नीरा : गुड, गुड, गुड। मैं अभी भी वहां..भरोसे के कारण हूं। उन्हें भरोसा कायम करना है, यू नो।
तरुण दास : मुलाकात ऑफिस, घर या कहां हुई?
नीरा : उनके घर पर। हां। ऑफिस में मिलने से मैंने मना कर दिया था। मैंने कहा मैं आपके लिए काम नहीं कर सकती, क्योंकि आप रतन के विचारों को जानते हैं।
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कबीर के दोहे, कॉमनवेल्थ खेल के परिप्रेक्ष्य में..

साई इतना दीजिये, जितना कलमाडी खाय !
सात पुश्त भूखी ना रहे, कोई चिंता नही सताय !!

गिल कलमाडी दौऊ खडे, काके लागू पांय !
बलिहारी मै दौऊ पर, भट्टा दिया बिठाय !!

लूट सके तो लूट ले, वेल्थ खेल की लूट !
पाछे फिर पछ्तायेगा, फिर नही मिलेगी छूट !!

गिर गया तो क्या हुआ, पुल था थोडा कमजोर !
चिंता काहे की करनी, माल तो लिया बटोर !!

चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह !
माल तो अंदर कर लिया, भरते रहो सब आह !!

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