भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध..

कॉमनवेल्थ खेल खत्म हुए २ महिने से ज्यादा हो गया, भारतीय जनमानस के ८०,००० करोड रुपयो का कुछ पता नही चला है.. और जो पता चला है वो ये कि देश मे एक नयी प्रणाली विकसित हो गई है, जो मिल जुल कर काम कर रही है, इसमे पत्रकार हैं, नेता हैं, व्यवसायी हैं, अधिकारी है. एक घेरा बना हुआ है जिसके बीच मे भारतीय जनमानस है और चारो ओर से इन सुरसाओ ने अपना मुँह खोला हुआ है.. भारतीय जनमानस को इतना असहाय और शासको का इतना अधिक नैतिक और चारित्रिक पतन आज तक नही सुना.. चोर शासको ने प्रणाली के अंदर स्वयं को बचाने के लिये पहले वैधानिक चोर दरवाजे बनाये, और फिर अपने को बेनकाब कर सकने वाले अन्य समूहो के प्रतिष्ठित सौदागरो को जिन्हे वो पत्रकार और अधिकारी कहते हैं, उन्हे भी अपनी प्रणाली का हिस्सा बना लिया, आम जनमानस को ठगा गया और ठगे गये पैसे की बंदरबॉट हुई, जिन्हे राष्ट्र हित सर्वोपरि रखना चाहिये था उन्होने स्वयं के और अपने स्वजनो के लाभ हेतु मौन धारण किया.

सत्तायें अब जनमानस के लिये कम और स्वयं के विकास के लिये ज्यादा ध्यान देने लगी, बोफोर्स, कॉमन्वेल्थ खेल, आदर्श सोसायटी, चारा, जमीन, खनन, पी एफ.. एक अंतहीन सारणी बनने लगी है लेकिन जब जॉच और सजा को देखते हैं तो एक पंक्ति भी नही भरती.. लोभ सिर्फ सत्ता तक सीमित नही रह गया है, लोभ सत्ता के साथ साथ आर्थिक सम्पन्नता का भी हो गया है. और सत्ता सुख सतत रूप से मिलता रहे, इसके लिये पत्रकार, व्यवसायियो के साथ मिलकर नेताओ ने ये प्रणाली विकसित की. पिछले कुछ दशकों से नेताओ के चरित्र और कार्यो का विश्लेषण करें तो लगता है कि सत्ता काजल की कोठरी हो गई है, जो उजला गया वो काला हो कर निकला, जो काला गया तो भुजंग हो कर निकला, और कोठरी मे जिसका दम घोटा गया वो आम जनमानस था. जो सफेद होने का ढोंग दिखाते हैं, वो मौन हैं और अपने स्वजनो को लूट खसूट की मौन स्वीकृति दे कर सत्ता सुख मे लीन हैं. सत्ताधीशो के लिये ५ साल अपनी सरकार चलाना एक मात्र उपलब्धि हो गया. राष्ट्र की उन्नति अब सत्ताओ के लिये कोई विषय नही है, सत्ता वापसी अब ज्यादा चिंता का विषय है, कागजी योजनाओ को भिन्न टीवी चैनलो पर प्रसारित कर के आम जनता को मरिचीका दिखाने का भार पत्रकारो ने लिया, लूट से अर्जित की गई संपत्ति से अरबपति बन कर लोगो को बताया गया कि भारत मे अरबपतियों की संख्या मे बढोत्तरी हो रही है, अधिकारियों को सत्ता सुख, भ्रष्टो को ऊंचे पदो और लूट का हिस्सा दे कर उन्हे उनके कर्तव्यो से विमुख किया गया और इस प्रकार ये भिन्न भिन्न श्रेणी की सुरसाओ से मिलकर बनी प्रणाली ने सत्ताओ पर बैठे लुटेरो की राह आसान कर दी.

लोकतंत्र की असहायता ये है कि उसके पास अधिकार ५ वर्ष मे एक बार आता है, और बाकि समय यदि वो चाहे तो भी कुछ नही कर सकता, लोकतंत्र की अंतिम कडी एक साधारण मनुष्य को इतना अक्षम कर दिया है कि वो एक दिन के विरोध के लिये भी अपने कार्य को नही छोड सकता, यदि उसको विरोध करने के लिये कहा जाये तो वो सहम जाता है और ऐसे डरता है जैसे उसे कोई चोरी करने के लिये कहा जा रहा हो. इस प्रणाली के रचियता और रक्षको का आत्मविश्वास इतना अधिक है कि जो उन पर उंगली उठाये वो उस संस्था (कैग) को या तो गलत बताते हैं या फिर जो उन पर उंगली उठा सकती है (जेपीसी) वो उसे बनने से रोकने के लिये संसद के पूरे सत्र का बलिदान देने से भी नही चूक रहे. भारतीय लोकतंत्र का ये नया शत्रु अपराधियों के राजनीतिकरण से भी अधिक भयावह है, एक अपराधी का आम जनमानस को पता होता है कि वो अपराधी है, लेकिन इस प्रणाली मे एक साधारण व्यक्ति किस पर संदेह करे, यहॉ तो जिसे खेत के रक्षक का काम करना चाहिये था वो खुद फसल को खा कर खेत बेचने के सौदे कर रही है,

राष्ट्र को यदि फिर से ठीक मार्ग पर लाना है तो इस देश को खाने वाली इस प्रणाली मे बसे एक एक हिस्से को काट कर बाहर निकालना होगा.. सत्ता से अपेक्षा करना व्यर्थ है, कोई सत्ता लोलुप स्वयं के भाग निकलने के मार्गो को बंद करेगा, ये आशा करना ही बेकार है. और पत्रकार, व्यवसायियो की जमात के मुँह लगा खून का स्वाद वो इतनी जल्दी भूल जायेंगे, इसकी संभावना भी कम ही लगती है. परिवर्तन तभी आ सकता है जब हम स्वयं एक ऐसी प्रणाली विकसित करें जिसके सामने कोई भी व्यक्ति या समूह भ्रष्ट आचरण करने से घबराये, ये प्रणाली संवैधानिक रूप से बनाई जाये या फिर सामाजिक रूप से, लेकिन यदि इसे जल्दी विकसित नही किया गया तो सत्ताधीशो, व्यवसायी, पत्रकार और अधिकारियो का ये गिरोह व्यक्ति, समाज, राष्ट्र को बेच कर खा जायेगा. राष्ट्र की अधोगति के लिये उत्तरदायी इस गिरोह के विरोध के लिये कुछ लोग प्रयास रत हो गये हैं, शासको से मात्र उपेक्षा और आश्वासन ही मिल सकते हैं, सत्ता और शासको को नियंत्रित करने के लिये कोई ना कोई सामाजिक / संवैधानिक व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है, इस परिवर्तन के लिये यह आवश्यक है कि पहले संगठित हुआ जाये और फिर एक प्रणाली विकसित की जाये जिस से सत्ता मे भ्रष्टाचार के विरुद्ध भय उत्पन्न किया जा सके और भ्रष्टाचारियों को नियंत्रित कर के उन्हे सजा का प्रावधान किया जा सके.
ऐसी ही एक प्रणाली के विकास के लिये आपका फेसबुक पर स्वागत है, भ्रष्टाचार से त्रस्त हो कर उसके विरोध के लिये एक समूह India Against Corruption बनाया गया है, जिसका लिंक इस प्रकार है.

http://www.facebook.com/home.php#!/IndiACor

कृपया इस मे भाग ले कर अपने विचारो से अवगत करायें..
धन्यवाद.

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नीरा राडिया की विभिन्न भ्रष्टों से हुई बातचीत (www.bhadas4media.com से साभार)

मैं पीएम के घर से निकलते ही आजाद से बात करूंगी : बरखा दत्त
बरखा दत्त – ग्रुप एडिटर, एनडीटीवी चैनल (अंग्रेजी)

नीरा- हाय, क्या मैंने तुम्हें जगा दिया?
बरखा- नहीं नहीं, मैं उठ गई थी, पूरी रात ही हो गई। मामला वैसे ही अटका हुआ है।
नीरा- हां, सुनो, वो उनसे सीधी बात करना चाहते हैं। अब यही समस्या है।
बरखा- हां तो, पीएम उसके (दयानिधि मारन के) मीडिया में चले जाने से खफा हैं।
नीरा- लेकिन बालू ने ऐसा ही किया ना.. करुणानिधि ने उसे ऐसा करने को नहीं कहा था।
बरखा- अच्छा, ऐसा क्या।
नीरा- उससे कहा गया था कि वह आ जाए और कांग्रेस से बात करे।
बरखा- और उसने सब खुलासा कर दिया।
नीरा- हां, मीडिया बाहर ही मौजूद था।
बरखा- हे भगवान, तो अब क्या? मुझे उन्हें क्या बताना है? बताओ, मैं वो बात कर लूंगी?
नीरा- मैंने उनकी (करुणानिधि की) पत्नी और बेटी से लंबी बात की। उनकी समस्या यह है कि वे (कांग्रेस नेता) सीधे करुणानिधि से बात करना चाहते हैं। लेकिन वे ऐसा मारन और बालू के सामने नहीं कर सकते। उन्हें करुणानिधि से सीधी बात करने की जरूरत है। कांग्रेस के पास तमिलनाडु में बहुत से नेता हैं, जो करुणानिधि से सीधी बात कर सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या अझागिरी के समर्थक हैं, जो मारन को कैबिनेट में लिए जाने के खिलाफ हैं और अझागिरी को राज्य मंत्री का दर्जा देने से असंतुष्ट हैं।
बरखा- मुझे पता है।
नीरा- कांग्रेस को करुणानिधि को यह बताने की जरूरत है कि हमने मारन के बारे में कुछ नहीं कहा।
बरखा- ओके, मुझे उनसे फिर बात करने दो।
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बरखा- हाय नीरा
नीरा- बरखा, हाय, मैंने उनसे फिर बात की और वे यह मान रही हैं कि उन्हें इस तरह सूची नहीं भेजनी चाहिए, .. लेकिन मुद्दा यह है कि विभागों के बंटवारे पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई।
बरखा- क्या वाकई?
नीरा- बरखा, मुझे पता चला है कि कांग्रेस किसी से बात कर रही है लेकिन भगवान जाने डीएमके में वह कौन है।
बरखा- हां, मारन ही होना चाहिए।
नीरा- हां, अब उन्हें यह करने की जरूरत है कि उन्हें कनीमोझी से बात करनी होगी ताकि वह अपने पिता से चर्चा कर सकें। यहां तक कि प्रधानमंत्री के साथ चर्चा में वही दुभाषिए की भूमिका में थी, लेकिन वह सिर्फ दो मिनट की ही बातचीत थी।
बरखा- ओके
नीरा- वो कह रही है कि कोई वरिष्ठ नेता जैसे गुलामनबी आजाद.. क्योंकि उनके पास बातचीत का अधिकार है।
बरखा- ठीक है। मैं आरसीआर (प्रधानमंत्री निवास) से निकलते ही आजाद से बात करूंगी।
बरखा- देखो, क्या हुआ कि कांग्रेस में सभी शपथ ग्रहण समारोह में व्यस्त थे। तो मैं किसी से बात नहीं कर पाई। अब सब खत्म हुआ है तो मैं फोन करती हूं।
नीरा- कनीमोझी अभी चेन्नई पहुंची हंै। मेरी अभी बात हुई है।
बरखा- दया कहां है? कहां है मारन?
नीरा- दया शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आया क्योंकि उसे वापस बुला लिया गया। वह करुणानिधि को बताने गया है कि उसे अहमद पटेल ने शपथ के लिए बुलाया था। लेकिन नेता (करुणानिधि ) कह रहे हैं कि इसके लिए उसे कांग्रेस में शामिल होना पड़ेगा।
बरखा- (हंसते हुए) तो अब?
नीरा- तो राजा ही बचा है जिसे शामिल होना चाहिए। और वो 8.40 बजे की फ्लाइट से आ रहा है..
बरखा- ओके

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मैंने दोनों भाइयों के बीच बातचीत की कोशिश की थी :प्रभु चावला
प्रभु चावला : संपादक, भाषाई प्रकाशन, इंडिया टुडे

नीरा- हाय प्रभु!
प्रभु- हां बताओ
नीरा- कुछ नहीं, मैं सिर्फ आपसे स्थितियां समझना चाहती थीं। प्रभु- किस बारे में? नीरा- इस महान ऐतिहासिक फैसले के बारे में क्या विचार है।
प्रभु- कौन-सा, बॉम्बे वाला?
नीरा- जिसने परिवार को देश हित के ऊपर खड़ा कर दिया।
प्रभु- देखिए जहां दोनों भाई (मुकेश और अनिल अंबानी) शामिल होंगे, वहां देश को भी शामिल होना पड़ेगा?
नीरा- शायद यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा।
प्रभु- लेकिन दोनों भाई एक-दूसरे से बात नहीं करते। ऐसा कोई है भी नहीं जो दोनों को बात करने के लिए मजबूर कर दे।
नीरा- वो तो होगा नहीं, प्रभु तुम भी जानते हो।
प्रभु- मैंने कोशिश की थी, नहीं हुआ। वो (मुकेश अंबानी) कभी जवाब नहीं देता। इसलिए मैंने उसे फोन करना बंद कर दिया है। उसको मैंने 15-20 दिन पहले मैसेज भेजा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद मैंने मैसेज नहीं भेजा। फैसला आने से पहले मैं उसके बारे में मालूम करना चाहता था।
नीरा- क्या फैसला उसके खिलाफ आ रहा है।
प्रभु- हां, लेकिन इतना घमंडी है ना, उसके साथ क्या करें? दोनों भाइयों को मैं समझ नहीं पाता।
नीरा- प्रभु मुझे एक बात बताओ। फैसला फिक्स है ना?
प्रभु- देखो इस देश में, दोनों के पास फिक्स करने की क्षमता है। छोटा भाई पैसे कम खर्च करता है, कंजूस है सबसे ज्यादा। लेकिन वो बड़े भाई के मुकाबले ज्यादा मोबाइल है। बड़ा भाई तो धीरूभाई की तय की हुई सीमा से आगे जाना ही नहीं चाहता। वो उन्हीं लोगों पर निर्भर है जिन्हें धीरूभाई ने बनाया। अब वे किसी काम के नहीं। अनिल ने नए सूत्र बनाए हैं, नए संपर्क, नई सोच विकसित की है। यदि उसको कुछ.. क्योंकि आज-कल सब फिक्स हो जाता है। यदि सुप्रीम कोर्ट में उलट-फेर हो गया तो वह सालों के लिए बर्बाद हो जाएगा। यदि उसके पक्ष में फैसला नहीं आया तो? तब तो वह खत्म ना?
नीरा- कोर्ट के आर्डर में, 328 पन्नों में, मैं आपको दे सकती हूं। मैं बताऊं डुअल टेक्नोलॉजी मामले में जो वाहनवती ने करवाया, राजा ने डॉ. शर्मा को ट्राई चेअरमैन बनाया। मैं गारंटी देती हूं उसमें वही पैन ड्राइव इस्तेमाल की गई होगी।
्र
प्रभु- जिस तरह वह (मुकेश) सुप्रीम कोर्ट जा रहा है, इससे ज्यादा मैं तुमको कुछ नहीं बता सकता। जिन लोगों को वह इस काम के लिए इस्तेमाल कर रहा है, वे भरोसे के काबिल नहीं हैं। तो इन कमजोर कड़ियों को मजबूत करना है ना?
नीरा- अनिल अपना लगा होगा, अपने लोगों के जरिए, डीएमके के जरिए, अपने चीफ जस्टिस के साथ।
प्रभु- नहीं, चीफ जस्टिस केरल का है। मुकेश जिस तरीके से चल रहा है, मैं कहना चाहता हूं कि वह सही नहीं है।
नीरा- मैं बात करूंगी थोड़ी देर में, मैं बोलूंगी कि वो (मुकेश अंबानी) आपसे बात करे।
प्रभु- मैंने उसे मैसेज भेजा था। दस बार मैसेज भेजा, उसने जवाब नहीं दिया। मैं इस मामले में पड़ना नहीं चाहता.. क्योंकि मेरा बेटा अनिल के लिए काम करता है। मैं उससे कुछ भी बात नहीं करना चाहता। लेकिन सुन तो लेता हूं, इधर-उधर पोलिटिकल लोगों से। लेकिन वह उसके लिए नहीं खड़ा हो रहा है। मेरा बेटा इस केस में शामिल नहीं है। वह इस केस में मेरे बेटे पर भरोसा नहीं करता है। अनिल को मेरे बेटे पर भरोसा नहीं है।
नीरा- आपका बेटा किसके साथ है?
प्रभु- वह अनिल के लिए काम करता है। उसकी अपनी वकालत कंपनी है। वह कई लोगों के लिए काम करता है। अनिल की मोबाइल कंपनी ने उसे काम दिया था। इस केस में वह उसके साथ नहीं है। लेकिन इधर-उधर से चीजें तो पकड़ ही लेते हैं सब। मेरे पास जो जानकारी है, वह कानूनी क्षेत्र के सूत्रों से मिली है। एक बार जब तुम बताओगी कि प्रभु, लंदन के लोगों से मिली जानकारी के आधार पर तुम्हारे बारे में कुछ कह रहे थे तो वो समझ जाएगा।
नीरा- उन्हें बताऊंगी।
प्रभु-छोटा भाई बड़ा हरामी है।
नीरा-हरामी तो है लेकिन हर वक्त हरामीपना नहीं चलता ना?

एनडीटीवी पर बरखा दत्त का बयान

दिलीप पडगांवकर (टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक) ने पूछा : जब द्रमुक और कांग्रेस मंत्रिमंडल गठन पर पहले ही बातचीत कर रहे थे, तो आपको संदेशवाहक बनने की क्या जरूरत थी?
बरखा : एक पत्रकार की हैसियत से मैं तो केवल और जानकारी हासिल करने के लिए राडिया से बात कर रही थी।
संजय बारू (बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादक)- आपनेखुद कहा कि आप राडिया का संदेश अहमद पटेल तक पहुंचा देंगी?
बरखा : वह तो मैंने उनका विश्वास जीतने के लिए झूठा वादा किया था।
संजय बारू – आपने यह भी कहा कि आपने राजा के बारे में गुलाम नबी आजाद से बात कर ली है?
बरखा : मैंने झूठ बोला था।
मनु जोसेफ (ओपेन मैगजीन के संपादक) – सरकार के गठन में कॉपरेरेट पीआर का दो पार्टियों से बातचीत करना क्या दशक की सबसे सनसनीखेज खबर नहीं थी? आपने इसे रिपोर्ट क्यों नहीं किया?
बरखा – हां, मैं सही फैसला नहीं ले पाई, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि मैं किसी भी तरह सत्ता की दलाली या भ्रष्टाचार में लिप्त थी।
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हेडलाइन्स टुडे पर प्रभु चावला की सफाई

मैं मुकेश अंबानी को वैसे ही सलाह दे रहा था जैसे ‘द हिंदू’ के संपादक श्रीलंका सरकार को देते हैं
हरतोष सिंह बल (ओपन पत्रिका के राजनीतिक संपादक) : आप मुकेश अंबानी को गैस के बंटवारे पर फैसले के बारे में चेतावनी क्यों देना चाहते थे?
चावला : नहीं, मैं तो इस बारे में केवल उनसे बात (प्रोब) करके जानकारी लेना चाहता था।
बल : आपने टेप की स्क्रिप्ट में बदलाव कर दिया है। टेप में चेतावनी (फोरवार्न) शब्द है जबकि आपने स्क्रिप्ट में उसे बदल कर गहराई से बात करना (प्रोब) कर दिया?
चावला : नहीं आपका आरोप सरासर निराधार है। मैंने चेतावनी शब्द का प्रयोग ही नहीं किया।
एम जे अकबर (इंडिया टुडे के संपादकीय निदेशक): लेकिन आप मुकेश अंबानी को बिना मांगे सलाह क्यों देना चाहते थे?
चावला – मेरा मानना है कि मुके श और अनिल के झगड़े से पूरा देश प्रभावित हो रहा था। इसीलिए मैं उन दोनों को ही सलाह देना चाहता था कि उन्हें देश हित में समझौता कर लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। वैसे भी मैं अपने विचारों को लेकर अपने दर्शकों और पाठकों के अलावा और किसी के प्रति उत्तरदाई नहीं हूं। सभी संपादक अपने कॉलम में सलाह देते हैं। मैं तो वैसे ही सलाह दे रहा था जैसे एन राम श्रीलंका की सरकार को देते हैं।
एन राम (द हिंदू के संपादक) – मुझे भरोसा है कि प्रभु चावला ने कुछ भी गलत नहीं किया। बल्कि उन्हें तो सफाई देने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में बुलाया ही नहीं जाना चाहिए था।
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वीर सांघवी : एडवाइजर, हिंदुस्तान टाइम्स

वीर सांघवी : आपको पता है, मारन ने सोनिया से मुलाकात नहीं की।
नीरा : वे नहीं मिले। वीर : वे सोनिया से नहीं मिलेंगे। वे वहां थे। वे कहते हैं कि हमें आधिकारिक प्रवक्ता के रूप में नहीं देखा जा रहा है। उन्होंने थोड़ी देर पहले ही फोन किया था। मैंने आपका मैसेज देखा। वह हर आधे घंटे में गुलाम नबी आजाद को फोन कर नई मांगें पेश कर रहे हैं।
नीरा : हम्म्म्म
वीर : तो उन्होंने कहा कि वे दो दिन इंतजार करेंगे। मारन गुलाम नबी आजाद को लगातार फोन कर कह रहे हैं, हमसे बात करो, हमसे बात करो।
नीरा : काफी दिलचस्प है। मुझे गुलाम नबी से बात करके काफी अच्छा लगेगा। और आपको?
वीर : मैंने अहमद (पटेल) से बात की है। गुलाम नबी अहम शख्स नहीं हैं। अहमद प्रमुख व्यक्ति हैं।
नीरा : ठीक
वीर : हां, इसलिए अहमद कहते हैं कि गुलाम नबी, मारन से बात कर रहे हैं। लेकिन गुलाम हमारे आधिकारिक व्यक्ति नहीं है और हम मारन के साथ गंभीरता से बात नहीं कर रहे हैं। जहां तक उनका सवाल है, उन्होंने पांच अहम मंत्रालयों की मांग की है। यह एक मूर्खतापूर्ण और गैरवाजिब मांग है। अहमद कहते हैं, ‘हमने मारन से कह दिया है कि हम करुणानिधि से डील करेंगे, इसलिए वे लौट गए।’ वे कहते हैं, हमने एक वाजिब ऑफर दिया है, करुणानिधि का हम काफी सम्मान करते हैं, हम उनके साथ डील करना चाहते हैं। मारन के लिए हमारे मन में कोई सम्मान नहीं है।
…. …. …. ….

नीरा : लगता है कि वे अभी भी मारन को लेने के लिए काफी दबाव में हैं।
वीर : यह दबाव कहां से है?
नीरा : यह स्टालिन और उसकी बहन सेल्वी की तरफ से है। मुझे लगता है मारन ने स्टालिन की मां दयालु को 600 करोड़ रुपए दिए हैं।
वीर: इस तरह के दबाव के आगे बहस करना मुश्किल है।
नीरा : हां, मैं भी ऐसा ही सोचती हूं।
वीर : जब तक कि मारन को कैबिनेट मंत्रालय न मिले।
नीरा : हां, लेकिन मैं नहीं सोचती कि वे परिवार के तीन सदस्यों को मंत्री बनाएंगे। बहुत खराब संकेत जाएगा।
…………

वीर : हाय नीरा! नीरा : हाय वीर, तुम दिल्ली में हो या..
वीर : मैं जयपुर में हूं। आज शाम को लौट रहा हूं।
नीरा : मैं चाहती हूं.. मुझे नहीं मालूम कि आप कांग्रेस में किसी से पता करने की स्थिति में हैं या नहीं। मैं अभी कनिमोझी से मिली थी।
वीर : मैं सोनिया से मिलने वाला था, लेकिन यहां फंस गया। अब कल से पहले निकलना मुमकिन नहीं। मेरी राहुल से मुलाकात है, फिर भी कहो?
नीरा : नहीं, मैं तुम्हें बताऊंगी कि वे गलत व्यक्ति से बात कर रहे हैं और यह बात वे समझ नहीं पा रहे हैं। इसलिए नहीं कि मैंने मारन को अलग कर दिया। असल में करुणानिधि ने मारन को बातचीत के लिए नियुक्त नहीं किया है। अब आप जानते हैं कि यह राजनीतिक अस्थिरता जैसी स्थिति है, जहां कैबिनेट..
वीर : फिर मारन सुर्खियों में क्यों हैं। वे सभी उनसे नफरत करते हैं।
नीरा : हुआ यह कि मारन ने कांग्रेस को यह संकेत दिया है कि वे राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का ही पद स्वीकार करेंगे। पर यह बात आप मुझ पर छोड़ दो।
सब ठीक हो जाएगा। अभी कांग्रेस इस बात को समझ नहीं पा रही है।
वीर : उन्हें किससे बात करनी चाहिए।
नीरा : उन्हें सीधे करुणानिधि से, कनिमोझी से बात करनी चाहिए।
वीर : सोनिया ने कल उनसे बात की।
नीरा : नहीं, उन्होंने बात नहीं की। केवल प्रधानमंत्री ने बात की और वह भी तब, जबकि कनिमोझी उनके लिए दुभाषिए का काम कर रही थीं। बातचीत बहुत संक्षिप्त थी। चलो इस मसले को सुलझाएं। इसमें कुछ है नहीं।
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हैडलाइन्स टुडे पर वीर सांघवी ने कहा

वीर सांघवी (हैडलाइंस टुडे चैनल पर)

एम जे अकबर -आपने नीरा राडिया से हिदुस्तान टाइम्स में छपने वाले अपने कॉलम के लिए डिक्टेशन क्यों लिया?
सांघवी – मैं उसे केवल एक सूत्र की तरह इस्तेमाल कर जानकारी इकट्ठा कर रहा था।
एन राम – आपने उससे मिली जानकारी अपने कालम में हूबहू क्यों इस्तेमाल की?
सांघवी – अगर लोगों को लगता है कि मैंने गलती की तो मैं माफी मांगता हूं। मुझे उम्मीद है कि कांट-छांट कर जारी इस टेप के आधार पर लोग मेरे बारे में अपनी धारणा नहीं बदलेंगे। मेरा जमीर साफ है, लेकिन जो कुछ हुआ उसके बारे में मुझे बेहद अफसोस है। मैं भविष्य में और सावधान रहूंगा।
राम- लेकिन आपको राडिया का संदेशवाहक बनने की क्या जरूरत थी?
सांघवी – मैं तो राडिया से और जानकारी पाने की आशा में केवल राजनीतिक गपशप कर रहा था।
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रतन टाटा : टाटा समूह के चेअरमैन

नीरा : एटीएंडटी ने अनिल अंबानी से बात करना स्थगित कर दिया है।
रतन टाटा : क्या वाकई?
नीरा : हुआ यह कि मुकेश ने अपने अमेरिकी वकील के जरिए उन्हें एक पत्र भिजवाया, जिसमें कहा गया था कि हमारे पास राइट ऑफ रिफ्यूजल है। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे इसकी जांच कर रहे हैं और आगे बढ़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। यह कहीं खत्म नहीं होगा। अब वह अपनी पावर कंपनी के लिए चाइना पावर की बात कर रहे हैं। उन्हें पैसे जुटाने हैं।
रतन : चाइना पावर इस लेन-देन में पड़ेगी, मुझे शक है, क्योंकि वे कंजर्वेटिव हैं।
नीरा : लेकिन उसके पास है। टेलीकॉम स्पेस के लिए फ्रांस टेलीकॉम ने उन्हें नहीं कह दिया था। एटीएंडटी ने भी नहीं कहा। एमटीएन ने भी नहीं कहा। मुझे लगता है यह टेलस्ट्रा है।
रतन : ऑस्ट्रेलिया का?
नीरा : उन्होंने भी नहीं कहा है। इसलिए क्यूटेल के अलावा अब बात करने के लिए और कोई भी नहीं है। यह मुश्किल है।
रतन : तुमने शिवा (शंकरन) से बात की?
नीरा : हां, शिवा कोर्ट चला गया है। उसे 25 तारीख मंजूर नहीं है। हां, अब राजा ने मुझे बताया है कि वे उसे बिना स्पैक्ट्रम के लाइसेंस देना चाहते हैं। हां, मैं आज राजा से मिली थी। मैं उनसे मिलने गई थी और वे ठीक हैं। वे खुश हैं। चीफ जस्टिस से हरी झंडी मिलने के बाद वे खुश हैं। मैंने उन्हें बताया है कि एक पत्र उनके पास आ रहा है, केके का, यू नो। लेकिन वे नहीं समझ पाए कि यह पत्र क्यों है, चैक क्यों नहीं। मैंने कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि इसकी एक प्रक्रिया है और इसे आपको समझना होगा।
रतन : क्या उन्हें (राजा को) मालूम है कि कोई और भी उन पर निशाना साध रहा है?
नीरा : ताजा अफवाह यह है कि उनका कनिमोझी के साथ अफेयर है। बात सही नहीं है।
रतन : हां, पर ये फैलाई किसने?
नीरा : और कौन हो सकता है मारन ने। लेकिन यह सब राजा की वजह से है। जब कभी मीडिया उनसे या किसी और से मिलने आता है, वे कहते हैं कि कनि के प्रति उनके दिल में कितनी हमदर्दी है। वे हमेशा उनकी बात करते हैं, चाहे वे कितने ही दुखी क्यों न हों। उनका संकेत यह होता है कि वे उन पर जान छिड़कते हैं, लेकिन कनि उन्हें भाव नहीं देती। सभी उन्हें दो दिल एक जान कहकर उनके बारे में अफवाह उड़ाते। वे इस तरह के बेवकूफ इंसान हैं, जो नहीं समझता कि उनकी पत्नी उन्हें क्यों पीटना चाहती है। वे आज मुझे कह रहे थे, ‘तुम यह नहीं कह सकती कि मैं शरमा रहा हूं।’ मैंने कहा, ‘आई एम सॉरी, पर जरा अपनी आंखों को देखिए।’ वे इस तथ्य को छिपा नहीं सकते कि उनकी आंख लड़ गई है। और कनि मुझसे कहती हैं, ‘मुझे इस आदमी से दूर रखो।’
नीरा : आप अब भी मिडिल ईस्ट में हैं?
टाटा : हां। मेरी तो एक ही चिंता है कि मारन पूरी तरह से राजा के पीछे पड़ गए हैं। उम्मीद करता हूं राजा लड़खड़ा या फिसल न जाए या..
नीरा : नहीं, ऐसा नहीं है क्योंकि चीफ जस्टिस ने बयान जारी किया है कि किसी मंत्री ने हाईकोर्ट जज को फोन नहीं किया।
टाटा : क्या वाकई?
नीरा : चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने यह बयान जारी किया है। तो बात साफ हो गई है। जो भी हो, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था और मारन अब थोड़े मूर्ख नजर आ रहे हैं।
टाटा : मुझे तो अचरज होता है कि राजा के लिए तुमने जो कुछ किया उसके बाद वे यह खेल खेल रहे हैं।
नीरा : राजा ने बड़ी चतुराई से पूछा, ‘नीरा, कोर्ट के आदेश के खिलाफ मैं कैसे जा सकता हूं?’ मैंने कहा, ‘हैलो, मिस्टर राजा, आप कोर्ट के खिलाफ जा सकते हैं। आपको अदालत के कहे मुताबिक चलने की जरूरत नहीं है क्योंकि 4.4 (मेगाहट्र्ज) के लिए लाइसेंस है और इसकी व्याख्या आपको निकालनी है।’
टाटा : लेकिन अब नए एटॉर्नी जनरल …
नीरा : नहीं रतन, सॉलिसिटर जनरल अच्छे आदमी है, गोपाल सुब्रमनियम। वे ही व्याख्या करेंगे। मैं उनसे मिलने वाली हूं। मैंने उन्हें मैसेज भेजा था और उन्होंने कहा कि वे जब फ्री हो जाएंगे और घर में होंगे तो साढ़े पांच-छह बजे फोन करेंगे। ..हकीकत में वे उनसे (अनिल अंबानी ग्रुप) से घृणा करते हैं। मुझे लगता है राजा एजी को अपने पक्ष में करने में लगे होंगे। अनिल के लिए 6.25 (मेगाहट्र्ज) सिर्फ इसलिए करेंगे ताकि वे अपनी कंपनी में एटी एंड टी को शामिल कर सकें। उन्हें इक्विटी पार्टनर की जरूरत है वरना जो कर्ज का बोझ उन्हें मिला है उससे उबर नहीं पाएंगे।
टाटा : इस सब का पर्दाफाश क्यों नहीं हुआ?
नीरा : रतन, उन्होंने मीडिया को खरीद लिया है। मीडिया पर वे अपनी खरीदी की ताकत आजमा रहे हैं। मीडिया पर खर्च किया जाने वाला हर डॉलर वे यह पक्का करने में लगा देते हैं कि उन्हें नेगेटिव पब्लिसिटी न मिले।
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एनडीटीवी पर वॉक द टॉक कार्यक्रम में बोले रतन टाटा

क्या राडिया के टेप से जाहिर नहीं होता कि वह किसी खास को मंत्री बनवाने के लिए दबाव बना रही हैं?
मैंने ये टेप सुने हैं। विश्वास मानिए नीरा का ही नहीं दिल्ली में आप किसी का भी टेलीफोन टैप करें तो आपको ऐसी ही बातें सुनने को मिलेंगी। किसी व्यक्ति का पक्ष बिना सुने उसे सजा नहीं देनी चाहिए। टेप लीक होने के पीछे जरूर निहित स्वार्थ हैं। यह स्वाभाविक नहीं है। इसकी जांच होनी चाहिए।
क्या आप चाहते थे कि कौन संचार मंत्री बने?
मैं केवल सबसे लिए लेवल प्लेइंग फील्ड चाहता था। मैंने कभी नहीं चाहा कि राजा मंत्री बने या कोई और.. नीरा से बातचीत में मैंने कभी सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की बात नहीं की। मैंने उसके जरिए किसी को रिश्वत नहीं दी।
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ए राजा : पूर्व दूरसंचार मंत्री

नीरा : हैलो
राजा : राजा हियर
नीरा : हाय! मुझे अभी बरखा दत्त से मैसेज मिला है। वह कहती है.. कि वह आज रात प्रधानमंत्री ऑफिस जाने वाली है। वास्तव में उसी ने मुझे बताया कि सोनिया गांधी वहां गईं थीं। वह कहती है कि उन्हें आपके साथ कोई समस्या नहीं है, लेकिन बालू को लेकर समस्या है।
राजा: …लेकिन इस पर लीडर से तो विचार-विमर्श करना होगा।
नीरा : हां, हां..उन्हें लीडर के साथ चर्चा करनी होगी। उन्हें बताना होगा.. राजा : कम से कम.वन टू वन..इसे लीडर के सामने खुलासा होने दंे।
नीरा : वन टू वन, आमने-सामने? राजा : वन टू वन। कोई सीलबंद लिफाफे में मैसेज दे कि बालू को लेकर हमें गंभीर समस्या है।
नीरा : कांग्रेस से, ठीक?
राजा : हां
नीरा : ओके। मैं उसे बता दूंगी। वह अहमद पटेल से बात कर रही है, इसलिए मैं उससे बात करूंगी।
राजा : कम से कम फोन पर तो उन्हें कहा जाए। सर, यह समस्या है..हम बहुत सम्मान करते हैं, राजा से हमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन समस्या तो बालू है।
नीरा : फिर दूसरी समस्या को आप कैसे सुलझाएंगे?
राजा : दूसरी समस्या को हम धीरे-धीरे सुलझाएंगे, क्योंकि अब लीडर नीचे आ गए हैं।
नीरा : अब लीडर तीन तक नीचे उतर आए हैं?
राजा : मैं जानता हूं। कांग्रेस के दिमाग में यह किसने डाल दिया कि अझागिरी अंग्रेजी नहीं जानते?
नीरा : नहीं.नहीं.. बात सिर्फ यही नहीं है। आगे जाकर तो वे और स्टालिन ही पार्टी चलाएंगे क्योंकि ओल्ड मैन तो सठिया गए हैं और उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है। इसलिए कांग्रेस उनके साथ बिजनेस करने में खुश ही होगी, क्योंकि आखिर नेता तो वही होंगे। वे स्टालिन को भी कंट्रोल करते हैं। और यह कि अझागिरी अपराधी है। और यह कि वह पांचवीं पास से आगे नहीं पढ़े हैं।
राजा : यह बात मैंने अझागिरी को बताई..अब अझागिरी लीडर से बात करेंगे। नीरा : नहीं, लेकिन उन्होंने भी यह बात कही.. कि दिल्ली में मैं (मारन) ही वह व्यक्ति हूं जिससे अंतत: आपको डील करना पड़ेगा, क्योंकि स्टालिन तो राज्य में ही रहेंगे।
राजा : मैं जानता हूं। मुझे पता है कि किस प्रकार का प्रचार वह कर सकते हैं।……………..नीरा : मैंने आपको एक एसएमएस भेजा था। मैं कनिमोझी से बात कर रही थी तो सोचा कि… आखिर वे यही तो कह रहे हैं कि आपको वहां होना चाहिए।
राजा : हां
नीरा : लीडर भी यही कह रहे हैं कि आपको वहां होना चाहिए, आप जानते हैं.. दलित होने की बातें आप तो जानते ही हो। द्रविडियन. पार्टी.
राजा : मेरा मामला साफ है, है न?
नीरा : आपका मामला साफ है, हां। कल रात ही आपका मामला साफ हुआ।
राजा : बात सिर्फ यह है कि मारन मेरे खिलाफ कैम्पेन शुरू कर देंगे।
नीरा : आपको अलग तरह से लड़ाई लड़नी होगी।
राजा : हूं..वे प्रेस से कह सकते हैं प्रधानमंत्री फिर आ रहे हैं..ऐसा-वैसा.. स्पेक्ट्रम..
नीरा : नहीं, नहीं..हम संभाल लेंगे.. डोंट वरी। यहां तक कि कांग्रेस को भी वह बयान देना पड़ा। मैंने सुनील मित्तल से बात की थी. क्या चंदोलिया ने आपको बताया?
राजा : हम्म्म..सुनील मित्तल को बताएं कि उन्हें राजा के साथ पांच साल और काम करना होगा।
नीरा : मैंने यह बात उनसे कह दी है। पर फिर आपको भी अनिल (अंबानी) से दूरी बनानी होगी। आपको निष्पक्ष रहना होगा।
राजा : हां, यह हम कर सकते हैं।
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तरुण दास : सीआईआई के पूर्व प्रमुख

नीरा राडिया : तरुण, यह व्यक्ति दोपहर को वहां नहीं मिला। उसे चंडीगढ़ जाना था।
तरुण दास : नहीं, कोई बात नहीं।
नीरा : तो वह कह रहा है कि शुक्रवार को काम हो जाएगा।
तरुण दास : अगर सारी चीजें हो जाती हैं, तो डील क्या होगी?
नीरा : हम्म्म्म.. जमीन?
तरुण दास : ओके।
नीरा : आपके लिए पांच एकड़ का इंतजाम मेरी जिम्मेदारी है।
तरुण दास : ओके।
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तरुण दास : मैं अभी-अभी मुंबई पहुंचा हूं।
नीरा : मुकेश (अंबानी) आपका चार बजे इंतजार कर रहे हैं?
तरुण दास: रतन (टाटा) के साथ डिनर है।
नीरा : ओह, अच्छा। क्या आप उनसे कहेंगे कि आपकी मुकेश से मुलाकात हुई?
तरुण दास : मुझे बताना पड़ेगा। मैं आपको सब-कुछ बताऊंगा।
नीरा : टेलीकॉम की लड़ाई फिर शुरू हो गई है। मैंने सुनील से पिछले हफ्ते मुलाकात की है।
तरुण दास : क्या अकेले या और भी लोग साथ थे?
नीरा : नहीं, अकेले। सुनील मित्तल। सिर्फ यह समझने के लिए कि हम कहां हैं और क्या कर सकते हैं.. रतन अभी भी उन पर यकीन नहीं करते। वे उनके साथ मिलकर कुछ भी नहीं करना चाहते। लेकिन वे नहीं समझते कि इस वक्त हमें एक-दूसरे की मदद की जरूरत है। यही बात मैंने सुनील से भी कही है। मैंने कहा कि वे राजा के साथ अक्खड़ तरीके से पेश न आएं। यही बात रतन पर भी लागू होती है। वे सुनील से हाय-हैलो भी नहीं कर सकते, यू नो। उन्हें सुनील को उनकी अब तक की उपलब्धियों का श्रेय देना ही चाहिए।
तरुण दास : आपने सुनील को कैसे खोजा? आपको इसका ख्याल कैसे आया?
नीरा : गुड, गुड, गुड। मैं अभी भी वहां..भरोसे के कारण हूं। उन्हें भरोसा कायम करना है, यू नो।
तरुण दास : मुलाकात ऑफिस, घर या कहां हुई?
नीरा : उनके घर पर। हां। ऑफिस में मिलने से मैंने मना कर दिया था। मैंने कहा मैं आपके लिए काम नहीं कर सकती, क्योंकि आप रतन के विचारों को जानते हैं।
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कबीर के दोहे, कॉमनवेल्थ खेल के परिप्रेक्ष्य में..

साई इतना दीजिये, जितना कलमाडी खाय !
सात पुश्त भूखी ना रहे, कोई चिंता नही सताय !!

गिल कलमाडी दौऊ खडे, काके लागू पांय !
बलिहारी मै दौऊ पर, भट्टा दिया बिठाय !!

लूट सके तो लूट ले, वेल्थ खेल की लूट !
पाछे फिर पछ्तायेगा, फिर नही मिलेगी छूट !!

गिर गया तो क्या हुआ, पुल था थोडा कमजोर !
चिंता काहे की करनी, माल तो लिया बटोर !!

चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह !
माल तो अंदर कर लिया, भरते रहो सब आह !!

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कामन वेल्थ झेल का थीम गीत…

कृपया धुन के लिये प्रदीप जी का लिखा प्रसिद्ध गीत

“आओ बच्चो तुम्हे दिखाये, झांकी हिन्दुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ,
ये धरती है बलिदान की”
पर निम्न पन्क्तियों को समायोजित करने का प्रयास करें…

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आओ तुमको कथा सुनाये, नेता जी के चमत्कार की.
खेल खेल में पैसा  झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
टैक्स भी ले लिया…. काम भी नही किया.
टैक्स भी ले लिया…. काम भी नही किया.

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ये देखो इस सडक का गड्ढा, पहले थोडा हल्का था.
पानी तो भर जाता था, पर फिर भी ट्रैफिक चलता था.
साईड का खंबा टेढा था, पर बल्ब भी थोडा जलता था.
सडक खोद दी, बल्ब फोड दिया, चलने वाला डरता था.
सारे गड्ढे सडक हो गये, माया है झोलम झाल की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
बल्ब भी खा गया, खंबा भी खा गया.
बल्ब भी खा गया, खंबा भी खा गया.

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ये देखो इस पुल पर पहले, गाडी ठीक से जाती थी.
हिचकोले से खाती थी, और गिरते पडते जाती थी.
कलेजा मुह को आता था, और जान पर बन आती थी.
ना जाने क्यों अक्सर फिर, जुर्माना पर्ची कट जाती थी.
अब तो पैदल जाता हूं मै, जय हो जाम महान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
पुल भी बंद हुआ, और रोड भी बंद हुआ.
पुल भी बंद हुआ, और रोड भी बंद हुआ.

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ये देखो एक ट्रैक बडा सा, साइकल के लिये बनाया था.
एड्वैंचर सा लगे इसलिये, थोडा कम घिसवाया था.
साइकल बढिया चले इसलिये, ट्रैफिक को रुकवाया था.
पहले दिन जब चली साइकले, लोगो को बुलवाया था.
एक अस्पताल, दो गड्ढे मे, जय हो ट्रैक की शान की.
.खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
लोगो का क्या करना, मेरा ट्रैक तो टैस्ट हुआ.
लोगो का क्या करना, मेरा ट्रैक तो टैस्ट हुआ.

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ये देखो एक मशीन प्यारी, खेलो के लिये लगाई है.
केवल बालिग खेले इसको, गजब खेल खिलाई है.
अतिथियो के लिये एस्कार्ट्, बाहर से मंगवाई है.
“यूज” करें प्लीज आप इसको, बातें भी सिखाई हैं.
इन खेलो का नाम ना लेना, बातें हैं ये ज्ञान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
मूसली पावर दम.. पहलवान हैं हम.
मूसली पावर दम.. पहलवान हैं हम.

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चोट लगे जो खेलो मे तो, हम सिकाई करवायेंगे.
ढाई हजार की मशीन को हम, चार लाख मे लायेंगे.
इस्तेमाल वो हो ना हो हम, लाभ तो बतलायेंगे.
कुछ तो हमको खाने दो, हम कामन वेल्थ करायेंगे.
बाकि सब पर ध्यान न दो, लाज रखो देश सम्मान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
खा गये देश का धन… खा गये देश का धन.
खा गये देश का धन… खा गये देश का धन.

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कामन वेल्थ खेलो का गीत उसके भावार्थ सहित…

पेश है कामन वेल्थ खेलो का गीत उसके भावार्थ सहित..

प्रसंग : ये पद्य हमने कामन वेल्थ खेलो के गीत से लिया है.. यहां पर नेता अपनी कमाई की खुशी मे जोर जोर से गीत गा रहा है.. गीत का भावार्थ निम्न है..

भावार्थः नेता अपने साथ के ठेकेदारो को यारो कह कर सम्बोधित करता है और कह्ता है कि यारो मैने इंडिया बुला लिया.. अर्थात कि नेता ने पूरे देश से जितने भी ठेकेदार और कम्पनियां थी उनको दिल्ली बुला लिया है.. इसके आगे वो अपने द्वारा किये गये झोल झाल की प्रशंसा करते हुए कह्ते हैं कि ये खेल है और इस से बडा ही मेल है.. अर्थात इस झोल झाल मे बहुत लोग मिले हुए हैं.. और जो नही मिले उन्हे भी मिला लिया.. मिला लिया. (अतिरेक मे नेता इसे दो बार गाता है) इसके बाद वो फिर ठेकेदारो को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम लोग रुकना नही, क्यों कि अगर केवल इतना ही खा कर रुक गये तो फिर आगे मौका ना जाने मिले ना मिले.. इसलिये अभी हारना नही .. जुनून से या फिर कानून से.. किसी से भी नही रुकना.. बस मैदान मार लो.. पैसे मार लो.. झपट्टा मार लो.. अपने दूसरे अन्तरे मे नेता कह्ता है कि अगर मै ये माल खा कर पर्वत से भी ऊपर उठ जाऊं तो फिर ये दुनिया सलामी देगी..और मेरे इरादे कहीं सर् दिल ना हो जायें इसलिये तुम सभी ठेकेदार मुझे सूरज जैसी गरमी दो.. अपनी देश की माटी देखो कैसी सजी है. तुम इसे और ज्यादा सजाने के लिये ठेके उठाओ.. कई स्टेडियम हैं, सडकें हैं, पुल हैं मगर समय बहुत कम है.. क्यों कि खेल सिर्फ अभी हैं और सारा माल यहीं समाया हुआ है.. इसिलिये मुझे आजकल लगन लगी हुई है.. (अतिरेक मे नेता इस लगन वाली लाईन को कई बार बोलता है) बीच बीच मे नेता ठेकेदारो का उत्साह बढाने के लिये अंग्रेजी मे लेट्स गो लेट्स गो भी बोलता है.. जिसे अंग्रेजी समझ्ने वाले बडे नेता समझ लेते हैं..

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नेता का सरकारी झपट्टा..

एक नेता बहुत ही परेशान था, उसके साथ के कई नेता चारा, सडक, डामर, पनडुब्बी, तोप, प्रोविडेंड फंड, रिश्वत खा कर, और ईमान, धर्म, देश, न्याय, सुरक्षा बेच कर बहुत मोटे हो गये थे. नेता चूंकि खेल संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन फिर भी कुछ नही कर पा रहा था क्यों कि जो कमाई चारा, डामर, पनडुब्बी, तोपो मे थी वो कमाई खेलो मे नही हो पाती थी. लेकिन नेता जी अंदर से बहुत घाघ थे, वो जानते थे कि अभी ना सही कभी तो रजिया गुंडो मे फंसेगी. सो एक दिन उसे पता चला कि पुराने गुलाम देशो का एक संगठन है और उसके लिये खेलो का आयोजन होना है. तुरंत ही कार्र्वाई करते हुए उसने एक बजट बनाया और उसमे बताया की मामूली से खर्चे मे देश को बहुत सम्मान मिलेगा. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के नाम कि दुंदुभी बजेगी. नेता के प्रोपोजल पर खेलो के आयोजन के लिये सहमति व्यक्त कर दी गयी. नेता समझ गया कि बस अब यही मौका है, रजिया गुंडो की ओर आने लगी है. फंसा तो मै लूंगा ही. तो नेता ने योजना तैयार करनी शुरु कर दी. खेलो की तैयारी के लिये ७ साल का समय था. नेता के लिये ये जरूरी था कि खेलो के होने तक उसकी कुर्सी की ओर कोई आंख ना उठाये. और ये भी आवश्यक था कि काम हो या न हो लेकिन दिखना जरूर चाहिये. तो राजधानी मे तैयारियां शुरु हो गयी. ५ साल बीत गये, राजधानी मे कुछ भी नही बदला. एक दिन जनता को अचानक पता चला कि दो साल बाद राजधानी मे खेल होने वाले हैं. लेकिन तैयारी कुछ नही है. नेता ने सरकार को झिंझोड दिया और कुछ अपने जैसे नेताओ को साईड मे ले जा कर कान मे कुछ कहा. वो नेता भी सकते मे दिखे. कुछ दिन और बीत गये, एक दिन राजाज्ञा निकली कि लोगो पर एक अतिरिक्त कर लगाया जायेगा क्यों कि खेल होने हैं, जनता की समझ मे नही आया, लेकिन जनता ने कुछ नही कहा, उसने चुपचाप अतिरिक्त कर का बोझ अपने सर पर ले लिया. एक दिन लोग सुबह उठे तो देखा बडी बडी मशीने सडको को खोद रही हैं, खेलो की जगह तैयारियां चल रही थी, स्टेडियम बनाये जा रहे थे, पुल बनाये जा रहे थे. लोग बडे परेशान थे, कोई आफिस को देर से जा पा रहा था और कोई घर देर से आ पा रहा था. जब लोगो ने शिकायत की तो उनको कहा कि ये सब प्रगति के लिये है, और उनको सहयोग देना चाहिये. लोग नेता की बातो मे आ गये, उनको देश की प्रगति दिखाई दी. नेता को भी प्रगति दिखायी दे रही थी लेकिन कुछ जल्दबाजी मे नेता से कुछ गलतियां हो गई, नेता ने कुछ लोगो की प्रगति की ओर ध्यान नही दिया जिसके कारण वो लोग नेता से नाराज हो गये. और जनता को नेता की चतुरता का पता चल गया. नेता की पार्टी के बडे अधिकारी बडे परेशान थे कि क्या किया जाये, उन्होने एक उपाय निकाला, कुछ लोगो को बर्खास्त कर दिया गया और ज्यादा बडे नेता को आगे कर दिया, जिसने तुरंत ही अपने रिमोट कंट्रोल मे आये सिग्नल को देख कर कहा कि किसी को नही छोडा जायेगा, लेकिन खेल हो जाने दो, एक दूसरे नेता ने कहा कि अगर कोई खेल को नही देखेगा तो वो देश द्रोही होगा. जनता ने जब ये सुना तो समझ नही सकी, क्यों कि वो पिछले ७ सालो से वैसे ही काम करती चली आ रही थी जैसे वो उसके पहले के ६० सालो से कर रही थी. उसे समझ नही आया कि वो देश द्रोही क्यों है. जनता ने तो पैसे समय पर दे दिये थे, समस्या भी बिना शिकायत किये झेल ली थी, अब ये खेलो को क्यों झेले..?
उस देश मे कुछ लोग भावुक थे, उनसे चुप नही रहा गया, उन्होने नेता और घोटाले के खिलाफ कमर कस ली और खेलो को झेलने से मना कर दिया. स्वर बढने लगे, लोग जुडने लगे, नेता और परेशान हो गया. उसे समझ नही आया तो उसने फिर से अपना ब्रह्मास्त्र निकाला और कहा कि देश के सम्मान के लिये खेलो को सफल बनाओ. जनता पशोपेश मे है कि नेता कि पोल खोले या फिर देश को देखे. नेता देश का सम्मान गिरवी रख चुका है और जनता से आह्वान कर रहा है कि उस गिरवी रखे सम्मान को बचा ले. जनता भोली है, वो उलझन मे है कि क्या करे. लेकिन नेता और उसकी प्रजाति ने पिछ्ले कई सालो से जनता को लूटा है, नेता को कैसे छोड दिया जाये? खेल तो हो चुका है, नेता उसका स्वर्ण पदक भी जीत चुका है.? जनता भी देख चुकी है कि नेता जैसा खिलाडी कोई नही है.? तो फिर अब किसे देखने जायें..?
और वो नेता जो पदक झपट कर भाग चुका है उसे कैसे पकड कर वापस लाया जाये.. ये नेता का सरकारी झपट्टा है, नेता इतनी आसानी से हाथ नही आयेगा. जनता जानती है.
लेकिन इस बार नेता को नही भागने देना है, इस खेल के नियमो को बदलना होगा, इस खेल के स्थान को बदलना होगा, इस खेल के निर्णायको को बदलना होगा. और इस खेल के परिणाम को बदलना होगा..
आप सभी लोगो का सहयोग अपेक्षित है.. कृपया इस नेता को और उसके ऐसे खेलो को बंद करने कि मुहिम मे साथ दीजिये.. इस मुहिम मे साथी बनने के लिये फेसबुक मे कामनवेल्थ झेल को सब्सक्राईब करें..
आपके साथ की अपेक्षा मे..
किशोर बडथ्वाल.

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